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Saturday, 12 May 2012

जियो जग छोड़ उदासी-

उदासीनता की तरफ, बढ़ते जाते पैर ।
रोको रविकर रोक लो,  करे खुदाई खैर ।   
करे खुदाई खैर, चले बनकर वैरागी ।
दुनिया से क्या वैर, भावना क्यूँकर जागी ।
दर्द हार गम जीत,  व्यथा छल आंसू हाँसी ।
जीवन के सब तत्व, जियो जग छोड़ उदासी ।। 

Wednesday, 9 May 2012

रविकर अंकुर नवल, कबाड़े पौध कबड़िया -

Young girl sitting on a log in the forest
जलें लकड़ियाँ लोहड़ी, होली बारम्बार
जले रसोईं में कहीं, कहीं घटे व्यभिचार ।

कहीं घटे व्यभिचार, शीत-भर जले अलावा ।
भोगे अत्याचार,  जिन्दगी विकट छलावा ।

 
रविकर अंकुर नवल, कबाड़े पौध कबड़िया ।
आखिर जलना अटल, बचा क्यूँ रखे लकड़ियाँ ।।
Lohri
लकड़ी काटे चीर दे, लक्कड़-हारा रोज ।
लकड़ी भी खोजत-फिरत, व्याकुल अंतिम भोज ।
http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/f/f9/Sati_ceremony.jpg

ब्लॉग-विलासी दुनिया में-

ब्लॉग-विलासी दुनिया में, जो जीव विचरते हैं ।
 सुख-दुःख, ईर्ष्या-प्रेम, तमाशा जीते-करते हैं ।।

सुअर-लोमड़ी-कौआ- पीपल, तुलसी-बरगद-बिल्व 
अपने गुण-धर्मो  पर अक्सर व्यर्थ अकड़ते हैं ।    

तूती*  सुर-सरिता जो साधे, आधी आबादी  
काकू के सुर में सुर देकर  "हो-हो"  करते हैं |

हक़ उनका है जग-सागर में,  फेंके चाफन्दा*
जीव-निरीह फंसे जो 'रविकर',  आहें  भरते  हैं |

भावों का बाजार खुला,  हम सौदा कर  बैठे
इस जल्पक* अज्ञानी  के तो बोल तरसते हैं ||

जल्पक = बकवादी         तूती =छोटी जाति का तोता
चाफन्दा = मछली पकड़ने का विशेष  जाल
सुअर-घृणित वृत्ति        लोमड़ी-मक्कारी         कौआ-चालबाजी  
पीपल-ध्यान   तुलसी-पवित्रता    बरगद-सृष्टि      बिल्व-कल्याण

Monday, 7 May 2012

चले चतुर चौकन्ने चौकस -

श्वेत कनपटी तनिक सी, मुखड़ा गोल-मटोल ।
नई व्याहता दोस्त की, खिसकी अंकल बोल ।
चले चतुर चौकन्ने चौकस ।|

केश रँगा मूंछे मुड़ा, चौखाने की शर्ट |
अन्दर खींचे पेट को, अंकल करता फ्लर्ट |
मिली तवज्जो फिर तो पुरकस ||


धुर-किल्ली ढिल्ली हुई, खिल्ली रहे उड़ाय |
जरा लीक से हट चले, डगमगाय बलखाय |
रहा सालभर चालू सर्कस ||

दाढ़ी मूंछ सफ़ेद सब, चश्मा लागा मोट ।
इक अम्मा बाबा कही, सांप कलेजे लोट ।
बैठ निहारूं खाली तरकस ।।

Friday, 4 May 2012

राह - राह 'रविकर' रमता, मरी - मरी मिलती ममता-

  शोक-वाटिका की ऐ सीते !
     राम-लखन के तरकश रीते ||
जगह-जगह जंगल-ज्वाला , उठे धुआँ काला-काला|
प्रर्यावरण - प्रदूषण  ने, खर - दूषण  प्रतिपल  पाला || 
          कुम्भकरण-रावण जीते - 
          राम-लखन के तरकश रीते||
नदियों में मिलते नाले, मानव-मळ मुर्दे डाले |
'विकसित' की आपाधापी, बुद्धि पर लगते ताले||
          भाष्य बांचते भगवत-गीते -
         राम-लखन के तरकश रीते||
पनपे हरण - मरण  उद्योग, योग - भोग - संयोग - रोग |
काम-क्रोध-मद-लोभ समेटे, भव-सागर में भटके लोग ||
          मनु-नौका में लगा पलीते - 
         राम-लखन के तरकश रीते||
राग - द्वेष - ईर्ष्या  फैले,  हो  रहे  आज  रिश्ते  मैले |
पशुता भी चिल्लाये-चीखे, मानवता का दिल दहले ||
         रक्त-बीज का रक्त न पीते -
         राम-लखन के तरकश रीते||
राह - राह  'रविकर' रमता, मरी - मरी मिलती ममता |
जगह-जगह जल्लाद जुनूनी, भ्रूण चूर्ण कर न थमता ||
         कोख नोचते कुक्कुर-चीते - 
        राम-लखन के तरकश रीते ||

Thursday, 3 May 2012

तीन-पांच पैंतीस, रात छत्तिस हो जाती-

पाठ पढ़ाती पत्नियाँ, घरी घरी हर जाम   |
बीबी हो गर शिक्षिका,  घर कक्षा  इक्जाम | 
 
घर कक्षा इक्जाम, दृष्टि पैनी वो राखे |
गर्दन करदे जाम, जाम रविकर कस चाखे  |

तीन-पांच पैंतीस, रात *छत्तिस हो जाती |
पति तेरह ना तीन, शिक्षिका पाठ पढ़ाती ||

*३६

व्यस्त जमाने के पहलू में ऊँघे बच्चा -

कनरसिया के कानों के भी तंभ तंबूरे   --
मनभावन सुर-तालों को अब बेढब घूरे ||

कनकैया-कनकौवा का कर काँचा माँझा
गगन-पुष्प की खातिर मानव भटके-झूरे ।।

युवा मनाकर आठ पर्व  को  नौ-नौ  बारी
भूली - बिसरी  परम्पराएँ   अपनी  तूरे ||

नैतिकता के नए बनाए मानक अपने -
भोग-विलासी जीवन के हित पागल पूरे ||

व्यस्त जमाने के पहलू में ऊँघे बच्चा 
कैसे  पूरे  हों  बप्पा के  ख़्वाब अधूरे ||