पुत्रीरूपी रत्न की प्राप्ति
अरुन शर्मा 'अनन्त'
मेरी मंगल कामना, चल अब उँगली थाम | कर्तव्यों का पालना, सीधा सा पैगाम | सीधा सा पैगाम, ख्याल रख माँ बेटी का | रहे स्वस्थ खुशहाल, सीख ले तुरत सलीका | अरुण-मनीषाशीश, मिलें खुशियाँ बहुतेरी | सुता यशस्वी होय, विनय सुन मैया मेरी || |
Followers
Thursday, 11 July 2013
अरुण-मनीषाशीश, मिलें खुशियाँ बहुतेरी -
Monday, 8 July 2013
किन्तु नियामत लूटता, प्राणिजगत का ज्येष्ठ-
कुदरत रत रहती सतत, सिद्ध नियामक श्रेष्ठ ।
किन्तु नियामत लूटता, प्राणिजगत का ज्येष्ठ।
प्राणिजगत का ज्येष्ठ, निरंकुश ठेठ स्वार्थी ।
कर शोषण आखेट, भोगता मार पालथी ।
बेजा इस्तेमाल, माल का जब भी अखरत ।
देती मचा धमाल, बावली होकर कुदरत ॥
माल=वन / क्षेत्र / धन-संपत्ति / सामग्री आदि
Thursday, 4 July 2013
कैसे होंय प्रसन्न, सन्न हैं भक्त भगीरथ-
(1)
रथ-वाहन हन हन बहे, बहे वेग से देह ।
सड़क मार्ग अवरुद्ध कुल, बरसी घातक मेह ।
बरसी घातक मेह, अवतरण गंगा फिर से ।
कंकड़ मलबा संग, हिले नहिं शिव मंदिर से ।
करें नहीं विषपान, देखते मरता तीरथ ।
कैसे होंय प्रसन्न, सन्न हैं भक्त भगीरथ ॥
(2)
रुष्ट-त्रिसोता त्रास दी, खोले नेत्र त्रिनेत्र |
बदी सदी से कर गए, सोता पर्वत क्षेत्र |
सोता पर्वत क्षेत्र, बहाना कुचल डालना |
मरघट बनते घाट, शांत पर महाकाल ना |
शिव गंगा का रार, झेल के जग यह रोता |
नहीं किसी की खैर, त्रिलोचन रुष्ट त्रिसोता ||
त्रिसोता= गंगा जी
Monday, 1 July 2013
इधर इंद्र उत्पात , उधर इंद्रा का नाती -
बरसाती चेतावनी, चूक चोचलेबाज |
डूबे चारोधाम जब, चौकन्ना हो राज |
चौकन्ना हो राज, बहाया तिनका तिनका |
गिरा प्रजा पर गाज, नहीं कुछ बिगड़ा इनका |
जल-समाधि जल-व्याधि, बहा मलबा आघाती |
इधर इंद्र उत्पात , उधर इंद्रा का नाती ||
होवे हृदयाघात यदि, नाड़ी में अवरोध ।
पर नदियाँ बाँधी गईं, बिना यथोचित शोध ।
बिना यथोचित शोध, इड़ा पिंगला सुषुम्ना ।
रहे त्रिसोता बाँध, होय क्यों जीवन गुम ना ?
अंधाधुंध विकास, पड़ी प्रायश्चित रोवे ।
भौतिक सुख की ललक, तबाही निश्चित होवे ।।
त्रिसोता = भागीरथी ,अलकनंदा और मन्दाकिनी
Thursday, 27 June 2013
उत्तरीय उतरे उमड़, उलथ उत्तराखंड --
नमन नमस्ते नायकों, नम नयनों नितराम-
(1)
नमन नमस्ते नायकों, नम नयनों नितराम |
क्रूर कुदरती हादसे, दे राहत निष्काम |
दे राहत निष्काम, बचाते आहत जनता |
दिए बगैर बयान, हमारा रक्षक बनता |
अमन चमन हित जान, निछावर हँसते हँसते |
भूले ना एहसान, शहीदों नमन नमस्ते -
(2)
उत्तरीय उतरे उमड़, उलथ उत्तराखंड |
कुदरत का कुत्सित कहर, देह भुगत ले दंड |
कुदरत का कुत्सित कहर, देह भुगत ले दंड |
देह भुगत ले दंड, हुवे रिश्ते बेमानी |
पानी का बुलबुला, हुआ है पानी पानी |
क्या गंगा आचमन, चमन सम्पूर्ण प्रस्तरी |
चालू राहतकार्य, उत्तराभास उत्तरी ||
उत्तराभास=अंड-बंड उत्तर / दुष्ट उत्तर
(३)
ज़िंदा लेते लूट, लाश ने जान बचाई -
खानापूरी हो चुकी, गई रसद की खेप ।
खेप गए नेता सकल, बेशर्मी भी झेंप ।
बेशर्मी भी झेंप, उचक्कों की बन आई ।
ज़िंदा लेते लूट, लाश ने जान बचाई ।
भूखे-प्यासे भटक, उठा दुनिया से दाना ।
लाशें रहीं लटक, हिमालय मुर्दाखाना ॥
(४)
सन्नाटा पसड़ा पड़ा, सड़ता हाड़ पहाड़ |
कलरव कल की बात है, गायब सिंह दहाड़ |
गायब सिंह दहाड़, ताड़ अब कारस्तानी |
कुदरत से खिलवाड़, करे फिर पानी-पानी |
सुधरो नहीं सिधार, खाय झापड़ झन्नाटा |
मद में माता मनुज, सन्न ताके सन्नाटा ||
कलरव कल की बात है, गायब सिंह दहाड़ |
गायब सिंह दहाड़, ताड़ अब कारस्तानी |
कुदरत से खिलवाड़, करे फिर पानी-पानी |
सुधरो नहीं सिधार, खाय झापड़ झन्नाटा |
मद में माता मनुज, सन्न ताके सन्नाटा ||
(५)
फेंकू का धत फोबिया, व्याधि व्यथा विकराल |
राल घोंटते गान्धिभक्त, है चुनाव का साल |
राल घोंटते गान्धिभक्त, है चुनाव का साल |
है चुनाव का साल, विदेशी दौरे छोड़े |
चले अढाई कोस, नहीं नौ दिन हैं थोड़े |
बेतरतीब विकास, गधह'रा हुल'के रेंकू |
किसका वह व्यक्तव्य, मीडिया असली फेंकू ||
श्लेष अलंकार पहचाने
गधह'रा हुल'के = बच्चे रेंकने के लिए हुलकते हैं
(६)
नंदी को देता बचा, शिव-तांडव विकराल ।
भक्ति-भृत्य खाए गए, महाकाल के गाल ।
महाकाल के गाल, महाजन गाल बजाते ।
राजनीति का खेल, आपदा रहे भुनाते ।
आहत राहत बीच, चाल चल जाते गन्दी ।
हे शिव कैसा नृत्य, बचे क्यूँ नेता नंदी ॥
Thursday, 6 June 2013
आँखे ताकें रोटियां, दंगा करते दाँत
जिभ्या के बकवाद से, भड़के सारे दाँत |
मँहगाई के वार से, सूखे छोटी आँत ||
आँखे ताकें रोटियां, दंगा करते दाँत ।
जिभ्या पूछे जात तो, टूटे दायीं पाँत ||
मतनी कोदौं खाय के, माथा घूमें जोर |
सर-साहब मदहोश हैं, नहीं व्यर्थ झकझोर ||
हाथों के सन्ताप से, बिगड़ गए शुभ काम |
मजदूरी पावे नहीं, पड़े चुकाने दाम ||
पाँव भटकने लग पड़े, रोजी में भटकाव |
चले कमाई के लिये, छोड़-छाड़ के गाँव ||
Wednesday, 5 June 2013
दोहन हनन समान तब, जब मनमोहन मौन-
दोहन हनन समान तब, जब मनमोहन मौन |
हनवाना हरदिन करे, रोक सकेगा कौन |
रोक सकेगा कौन, स्वयं कुदरत कुछ कर दे |
करे स्वयं संतुलित, स्वयं कुछ ऐसा वर दे |
सत्ता पाए शक्ति, सुधारे खुद के गोहन |
रोके बन्दर बाँट, तभी रुक पाए दोहन ||
Subscribe to:
Posts (Atom)