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Thursday, 11 July 2013

अरुण-मनीषाशीश, मिलें खुशियाँ बहुतेरी -

पुत्रीरूपी रत्न की प्राप्ति


अरुन शर्मा 'अनन्त' 

मेरी मंगल कामना, चल अब उँगली थाम |
कर्तव्यों का पालना, सीधा सा पैगाम |
सीधा सा पैगाम, ख्याल रख माँ बेटी का |
रहे स्वस्थ खुशहाल, सीख ले तुरत सलीका |
अरुण-मनीषाशीश, मिलें खुशियाँ बहुतेरी |
सुता यशस्वी होय, विनय सुन मैया मेरी ||
 

Monday, 8 July 2013

किन्तु नियामत लूटता, प्राणिजगत का ज्येष्ठ-

कुदरत रत रहती सतत, सिद्ध नियामक श्रेष्ठ ।
किन्तु नियामत लूटता, प्राणिजगत का ज्येष्ठ। 

प्राणिजगत का ज्येष्ठ, निरंकुश ठेठ स्वार्थी ।
कर शोषण आखेट, भोगता मार पालथी ।

बेजा  इस्तेमाल, माल का जब भी अखरत ।
 देती मचा धमाल, बावली होकर कुदरत ॥

माल=वन / क्षेत्र / धन-संपत्ति / सामग्री आदि

Thursday, 4 July 2013

कैसे होंय प्रसन्न, सन्न हैं भक्त भगीरथ-

 (1)
रथ-वाहन हन हन बहे, बहे वेग से देह ।
सड़क मार्ग अवरुद्ध कुल, बरसी घातक मेह ।

बरसी घातक मेह, अवतरण गंगा फिर से ।
कंकड़ मलबा संग, हिले नहिं शिव मंदिर से ।

 करें नहीं विषपान, देखते मरता तीरथ ।
कैसे होंय प्रसन्न, सन्न हैं भक्त भगीरथ ॥

(2)
रुष्ट-त्रिसोता त्रास दी, खोले नेत्र त्रिनेत्र |
बदी सदी से कर गए, सोता पर्वत क्षेत्र |

सोता पर्वत क्षेत्र, बहाना कुचल डालना |
मरघट बनते घाट, शांत पर महाकाल ना |

शिव गंगा का रार, झेल के जग यह रोता |
नहीं किसी की खैर, त्रिलोचन रुष्ट त्रिसोता ||

त्रिसोता= गंगा जी

Monday, 1 July 2013

इधर इंद्र उत्पात , उधर इंद्रा का नाती -

बरसाती चेतावनी,  चूक चोचलेबाज |
डूबे चारोधाम जब, चौकन्ना हो राज |

चौकन्ना हो राज, बहाया तिनका तिनका |
गिरा प्रजा पर गाज, नहीं कुछ बिगड़ा इनका |

जल-समाधि जल-व्याधि, बहा मलबा आघाती |
इधर इंद्र उत्पात , उधर इंद्रा का नाती ||


होवे हृदयाघात यदि, नाड़ी में अवरोध ।
पर नदियाँ बाँधी गईं, बिना यथोचित शोध ।

बिना यथोचित शोध, इड़ा पिंगला सुषुम्ना ।
रहे त्रिसोता बाँध, होय क्यों जीवन गुम ना ?

अंधाधुंध विकास, पड़ी प्रायश्चित रोवे ।
भौतिक सुख की ललक, तबाही निश्चित होवे ।।
त्रिसोता = भागीरथी ,अलकनंदा और मन्दाकिनी

Thursday, 27 June 2013

उत्तरीय उतरे उमड़, उलथ उत्तराखंड --

नमन नमस्ते नायकों, नम नयनों नितराम-

 (1)
नमन नमस्ते नायकों, नम नयनों नितराम |
क्रूर कुदरती हादसे, दे राहत निष्काम  |
दे राहत निष्काम, बचाते आहत जनता |
दिए बगैर बयान, हमारा रक्षक बनता |
अमन चमन हित जान, निछावर हँसते हँसते |
भूले ना एहसान, शहीदों नमन नमस्ते -
 (2)
 उत्तरीय उतरे उमड़, उलथ उत्तराखंड |
कुदरत का कुत्सित कहर, देह भुगत ले दंड |

देह भुगत ले दंड, हुवे रिश्ते बेमानी |
पानी का बुलबुला, हुआ है पानी पानी |

क्या गंगा आचमन, चमन सम्पूर्ण प्रस्तरी |
चालू राहतकार्य,  उत्तराभास उत्तरी ||

 उत्तराभास=अंड-बंड उत्तर / दुष्ट उत्तर 
(३)
 

ज़िंदा लेते लूट, लाश ने जान बचाई -

खानापूरी हो चुकी, गई रसद की खेप । 
खेप गए नेता सकल, बेशर्मी भी झेंप । 

बेशर्मी भी झेंप, उचक्कों की बन आई । 
ज़िंदा लेते लूट, लाश ने जान बचाई । 

भूखे-प्यासे भटक, उठा दुनिया से दाना ।
लाशें रहीं लटक, हिमालय मुर्दाखाना ॥
(४)
सन्नाटा पसड़ा पड़ा, सड़ता हाड़ पहाड़ |
कलरव कल की बात है, गायब सिंह दहाड़ |  


गायब सिंह दहाड़, ताड़ अब कारस्तानी |
कुदरत से खिलवाड़, करे फिर पानी-पानी |  


सुधरो नहीं सिधार, खाय झापड़ झन्नाटा |
मद में माता मनुज, सन्न ताके सन्नाटा ||
(५)
 फेंकू का धत फोबिया, व्याधि व्यथा विकराल |
राल घोंटते गान्धिभक्त, है चुनाव का साल |

है चुनाव का साल, विदेशी दौरे छोड़े |
चले अढाई कोस, नहीं नौ दिन हैं थोड़े |

बेतरतीब विकास, गधह'रा हुल'के रेंकू |
किसका वह व्यक्तव्य, मीडिया असली फेंकू ||


श्लेष अलंकार पहचाने
गधह'रा हुल'के = बच्चे रेंकने के लिए हुलकते हैं 
(६)
 
नंदी को देता बचा, शिव-तांडव विकराल । 
भक्ति-भृत्य खाए गए, महाकाल के गाल । 
 
महाकाल के गाल, महाजन गाल बजाते । 
राजनीति का खेल, आपदा रहे भुनाते । 
 
आहत राहत बीच, चाल चल जाते गन्दी । 
हे शिव कैसा नृत्य, बचे क्यूँ नेता नंदी ॥

Thursday, 6 June 2013

आँखे ताकें रोटियां, दंगा करते दाँत

जिभ्या के बकवाद से, भड़के सारे दाँत |
मँहगाई के वार से, सूखे छोटी आँत || 

आँखे ताकें रोटियां, दंगा करते दाँत । 
जिभ्या पूछे जात तो, टूटे दायीं पाँत ||

मतनी कोदौं खाय  के, माथा घूमें जोर |
सर-साहब मदहोश हैं, नहीं व्यर्थ झकझोर ||

हाथों के सन्ताप से, बिगड़ गए शुभ काम |
मजदूरी पावे नहीं,  पड़े चुकाने दाम ||

पाँव भटकने लग पड़े, रोजी में भटकाव |
चले कमाई के लिये, छोड़-छाड़ के गाँव ||

Wednesday, 5 June 2013

दोहन हनन समान तब, जब मनमोहन मौन-

दोहन हनन समान तब, जब मनमोहन मौन |
हनवाना हरदिन करे, रोक सकेगा कौन |

रोक सकेगा कौन, स्वयं कुदरत कुछ कर दे |
करे स्वयं संतुलित, स्वयं कुछ ऐसा वर दे |

सत्ता पाए शक्ति, सुधारे खुद के गोहन |
रोके बन्दर बाँट, तभी रुक पाए दोहन ||