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Monday, 11 March 2013

काटे पादप रोज, हरेरी ज्यादा भाये-

भाये ए सी की हवा, डेंगू मच्छर दोस्त ।

फल दल पादप काटते, काटे मछली ग़ोश्त ।


काटे मछली ग़ोश्त, बने टावर के जंगल ।

टूंगे जंकी टोस्ट, रोज जंगल में मंगल ।

खाना पीना मौज, मगन मनुवा भरमाये ।

काटे पादप रोज, हरेरी ज्यादा भाये ।।

Saturday, 9 March 2013

कोताही कर्तव्य में, मांगे नित अधिकार-

मोटी चमड़ी मनुज की, महाचंट मक्कार । 
कोताही कर्तव्य में, मांगे नित अधिकार । 

मांगे नित अधिकार,  हुआ है आग-बबूला । 
बोये पेड़ बबूल, आम पर झूले झूला । 

दे दूजे को सीख, रखे खुद नीयत खोटी । 
रविकर इन्हें सुधार, मार के चपत *चमोटी ॥ 
*चाबुक 

Friday, 8 March 2013

शादी बिन बारात, बिचारी अब भी औरत-

कर इनको आजाद, अन्यथा तोड़े खूंटा -

औरत रत निज कर्म में, मिला सफलता मन्त्र ।

 सेहत से हत भाग्य पर, नरम सुरक्षा तंत्र । 

 

 

नरम सुरक्षा तंत्र, जरायम बढ़ते जाते । 

करता हवश शिकार, नहीं कामुक घबराते । 

 

 

जिन्सी ताल्लुकात, तरक्की करता भारत । 

शादी बिन बारात, बिचारी अब भी औरत ॥

Thursday, 7 March 2013

लगा वंश पर दाँव, दुखी हो जाए दादी-

दादी दिल दिखता दुखित, द्रवित दिव्यतम तेज ।
देख पार्टी की दशा, रही लानतें भेज ।

रही लानतें भेज, किया था प्राण निछावर ।
सत्ता लोलुप लोग, चाहते केवल पावर ।

कल बेटा कुर्बान, टले पोते की शादी ।
लगा वंश पर दाँव, दुखी हो जाए दादी ॥

Monday, 4 March 2013

परम-प्रताड़क प्रेम, पड़ा रविकर मरघाटा-

सन्नाटा पसरा प्रकट, अन्तर हाहाकार । 
नैना पथराते गए,  हारे हठ-हुंकार । 

हारे हठ-हुंकार, यार हुशियार निकलता । 
करे सरहदें  पार, बढ़ाता जाय विकलता । 

परम-प्रताड़क प्रेम, पड़ा रविकर मरघाटा । 
उत उमंग उत्साह,  इधर पसरा सन्नाटा ॥ 


Saturday, 2 March 2013

सुगढ़ सलोनी कई, कई में सौ विकृतियाँ-

 
 


पहला पहला यंत्र है,  इस दुनिया का चाक । 
बना प्रवर्तक यंत्र का, कुम्भकार की धाक । 
कुम्भकार की धाक, पूर्वज मुनि अगस्त्य है । 
मिटटी पावक पाक, मृत्यु पर अटल सत्य हैं । 
देता कृति आकार, रचयिता सहला सहला । 
कुम्भकार भगवान्, प्रवर्तक सबसे पहला ॥ 

मिटटी रौंधे प्रेम से, करें पुंसवन कर्म । 
गढ़े घड़े के अंग कुल, अन्दर बाहर मर्म । 
अन्दर बाहर मर्म, धर्म कुल तत्व निभाएं । 
तप-तप चक चक चर्म, अग्नि अंतर दहकाए । 
बनता पात्र सुपात्र, मगर मत मारो गिट्टी । 
संस्कार दो शेष, बना दो पावन मिटटी ॥ 

 
अगस्त्य महर्षि  कुँभारन के पुरखा पहला हम मानत भैया । 
धरती पर चाक बना पहला शुभ यंतर  लेवत  आज बलैया । 
अब कुंभ दिया चुकड़ी बनते, गति चाक बनावत अग्नि पकैया ।
जस कर्म करे जस द्रव्य भरे, गति पावत ये तस नश्वर नैया ।। 

बलुई कलकी ललकी पिलकी जल-ओढ़ सजी लटरा मुलतानी ।
मकु शुष्क मिले कुछ गील सने तल कीचड़ पर्वत धुर पठरानी ।
कुल जीव बने सिर धूल चढ़े, शुभ *पीठ तजे, मनुवा मनमानी ।
मटियावत नीति मिटावत मीत, हुआ *मटिया नहिं पावत पानी ||
*देवस्थान / आसन                       *लाश


सुन्दर दोहे रच रहे, हरते मन का शोक ।
चाक चकाचक चल रहा, रे मानव मत रोक ।
रे मानव मत रोक, रचे अलबेली कृतियाँ ।
सुगढ़ सलोनी कई, कई में सौ विकृतियाँ ।
घालमेल में दक्ष, वायु जल अनल जलाकर ।
भू छोड़े नहिं अक्ष, कर्म सारे ही सुन्दर ॥



रविकर चाल सुधार, नहीं तो क्वांरा छोरा-

बड़ा बटोरा आज तक, लोलुपता ने माल |
बेंच बेंच दूल्हा किया,  शादीघर बदहाल  |

शादीघर बदहाल,  सुता चैतन्य आज है । 
बढ़ा चढ़ा विश्वास, स्वयं पर उसे नाज है । 

रविकर चाल सुधार, नहीं तो  क्वांरा छोरा । 
नहीं सकेगा भोग, माल जो बड़ा बटोरा ॥