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Friday, 5 October 2012

पुत्र-पिता-पति-भ्रातृ, पडोसी प्रियतम पगला-



 
बदला युग आधुनिक अब, बढ़ा सास-बधु प्यार ।
दस वर्षों का ट्रेंड नव, शेष बहस तकरार ।

शेष बहस तकरार, शक्तियां नारीवादी ।
दी विश्वास-उभार, मस्त आधी आबादी ।

पुत्र-पिता-पति-भ्रातृ, पडोसी प्रियतम पगला
लेगी इन्हें नकार, जमाने भर का बदला ।। 

4 comments:

  1. बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही भावनामई रचना शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन

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  2. हमने तो ऐसा किसी घर में नहीं देखा -कहाँ की बात कर रहे हैं आप ?

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    1. दीदी
      पिछले सप्ताह में दिल दहलाने वाली कुछ घटनाएँ -
      गिरिडीह और मुरादाबाद में अलग अलग
      माँ ने अपने तीन बच्चों की हत्या कर के स्वयं को ख़त्म कर लिया -
      अदालत में कन्या पक्ष के लोगों ने मिलकर पति की जबरदस्त पिटाई की-
      यह भी एक पक्ष है-

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    2. बंधु,ऐसी विरल घटनायें नियम का अपवाद होती हैं ,सामान्यीकरण नहीं .माँ ने अपने स्वार्थ के लिये बच्चों को नहीं मारा होगा ,ऐसा मुझे लगता है .और कन्या-पक्ष के लोगों द्वारा पिटाई ?
      सामान्यतया कोई संस्कारशीला नारी अपने पति का अनादर नहीं देखना चाहती .
      .जो बात पत्रकारों द्वारा उछाली जाती है अक्सर उसके पीछे के बहुत से तथ्य सामने नहीं होते. सनसनीखेज़ समाचार बनाने के लिये संवाददाता ऐसा करते हैं और अक्सर ही जनता उनकी बात मान लेती है क्यों कि दूसरे की बुराई पर विश्वास आसानी से हो जाता है .
      आपने जो पढ़ा उस पर लिखा,आपकी मान्यता,है पर मुझे नारीवाद के कारण यह हुआ ऐसा नहीं लगा .

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