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Saturday, 29 September 2012

ब्लॉग-वर्ल्ड अभि-जात, हकाले ऊल-जुलूली-


 मूली हो किस खेत की, क्या रविकर औकात ?
तुकबन्दी क्या सीख ली, भूला अपनी जात ।

भूला अपनी जात, फटाफट छान जलेबी ।
कहाँ कुंडली मार, डराता बाबा-बेबी ।

ब्लॉग-वर्ल्ड अभि-जात,  हकाले ऊल-जुलूली ।
उटपटांग कुल कथ्य, शिल्प बेहद मामूली ।। 

Friday, 28 September 2012

पौधा रोपा परम-प्रेम का, पल-पल पौ पसरे पाताली-



पौधा रोपा परम-प्रेम का, पल-पल पौ पसरे पाताली |
पौ बारह काया की होती, लगी झूमने डाली डाली |

जब  पादप की बढ़ी उंचाई, पर्वत ईर्ष्या से कुढ़ जाता -
टांग अड़ाने लगा रोज ही, काली जिभ्या बकती गाली |

लगी चाटने दीमक वह जड़, जिसने थी देखी गहराई  -
जड़मति करता दुरमति से जय, पीट रहा आनंदित ताली |

सूख गया जब प्रेम वृक्ष तो, काट रहा जालिम सौदाई -
आज ताकता नंगा पर्वत,  बिगड़ चुकी जब हालत-माली |

लगी खिसकने चट्टानें अब , भूमि स्खलित होती हरदम -
पर्वत की गरिमा पर धक्का, धिक्कारे जो दीमक पाली ।।

 

Thursday, 27 September 2012

टेढ़ी मूँछे चाहती, करना सीधी पूँछ -

टेढ़ी मूँछे चाहती, करना सीधी पूँछ ।
जबकि मानव कर्म शुभ, "वक्र-तुंड" बिन *छूछ ।
गणेश
*खाली 
वक्र-तुंड बिन छूछ, *खीर-टेढ़ी जो दीखे ।
^टेढ़ी-उंगली करें, देवता इंद्र सरीखे ।
*कठिन काम
^ कड़ाई करना 
*टेढ़ी भृकुटी देख, पूँछ परिचय जो पूँछे ।
पहचाने औकात, सफाचट टेढ़ी मूँछे ।।
*क्रोध 

Tuesday, 25 September 2012

घाट-घाट जल 'पी लिया', दुनिया दिया चराय -

घाट-घाट जल 'पी लिया',  दुनिया दिया चराय ।
पानी दूषित था मगर, आज 'पीलिया' खाय ।

आज 'पीलिया' खाय, विकट बरसाती मौसम ।
भोग राजसी रोग, पड़ा बिस्तर पर बेदम ।

किया घाट ही घाट, पहन चोला यह वल्कल ।
आया चिंतन-काल, छानिये घाट-घाट जल ।।
यमक -
*'पीलिया'= जांडिस 
* घाट = छल-कपट 

अपना मतलब गाँठ, जानते दुष्ट छोड़ना-


मन की गाँठों से सदा, बढ़ता दुःख अवसाद ।
मन की गाँठे खोल दे, पाए मधुरिम स्वाद ।
पाए मधुरिम स्वाद, गाँठ का पूरा कोई ।
चले गाँठ-कट चाल, पकड़ के खुपड़ी रोई ।
रविकर लागे श्रेष्ठ, सदा ही गाँठ जोड़ना ।
अपना मतलब गाँठ, जानते दुष्ट छोड़ना ।।

Sunday, 23 September 2012

करे कर्म कन्या कठिन, किस्मत कुंद कड़ाकु-

तीसरी प्रस्तुति  

'चित्र से काव्य तक' प्रतियोगिता अंक १८ 

http://www.openbooksonline.com/

दोहे
काँव काँव काकी करे, काकचेष्टा *काकु ।
करे कर्म कन्या कठिन, किस्मत कुंद कड़ाकु ।।
*दीनता का वाक्य 

आठ आठ आंसू बहे, रोया बुक्का फाड़ ।
बोझिल बापू चल बसा, भूल पुरानी ताड़ ।।

हुई विमाता बाम तो, करती बिटिया काम ।
शुल्क नहीं शाला जमा, कट जाता है नाम ।।

रविकर बचिया फूल सी, खेली "झाड़ू-फूल" ।
झेले "झाड़ू-नारियल",  झाड़े करकट धूल ।।
 (फूल-झाड़ू -घर के अन्दर प्रयुक्त की जाती है । नारियल झाड़ू बाहर की सफाई के लिए।)
 
 बढ़नी कूचा सोहनी, कहें खरहरा लोग ।
झाड़ू झटपट झाड़ दे, यत्र-तत्र  उपयोग ।।

सोनी *सह न सोहती, बड़-सोहनी अजीब ।
**दंड *सहन करना पड़े, झाड़ू मार नसीब ।।
*यमक  
**श्लेष 


(कुंडलियां) 

 दीखे *झाड़ू गगन में,  पुच्छल रहा कहाय ।
 इक *झाड़ू सोनी लिए, उछल उछल छल जाय ।
उछल उछल छल जाय, भाग्य पर झाड़ू *फेरे ।
*फेरे का सब फेर, विमाता आँख तरेरे ।
सत्साहस सद्कर्म, पाठ जीवन के सीखे ।
पाए बिटिया लक्ष्य,  अभी मुश्किल में दीखे ।।
* फेरना /  शादी के फेरे 




परदेशी मेहमान, ढूँढ़ के मुझको लाया-

बहकावे में गैर के, ना आना नादान ।
इस पर पहला हक़ रखूँ ,  बन्दा बड़ा प्रधान । 
बन्दा बड़ा प्रधान, गधा सा सधा सधाया ।
परदेशी मेहमान, ढूँढ़ के मुझको लाया ।
घर से लेकर घाट, घुटाले मन बहलावे ।
चला डिफीसिट पाट, हमें वो ही बहकावे ।।

गिरहकटों उद्यान में, ढूँढ़ रहे क्या चीज । 
क्या पैसों के पेड़ को, किंवा उसका बीज ।
 किंवा उसका बीज, सुनो मोहन की गीता ।
जनता की यह जेब, करे है सभी सुबीता ।
हमने तो ली काट, काट कर देखो प्यारे ।
है कुबेर-भण्डार,  माल ये बड़ा डकारे ।।

मनी-प्लांट लो लूट, चलो फिर देश चराने-

देश चराने के लिए, पैसे की दरकार ।
पैसे पाने के लिए, अपनी हो सरकार ।
अपनी हो सरकार, नहीं आसान बनाना ।
सब जुगाड़ का खेल, बुला परदेशी नाना ।
नाना नया नकार, निखारे नाम पुराने ।
मनी-प्लांट लो लूट, चलो फिर देश चराने ।।

करती बंटाधार है, बंटी-बबली टीम ।
मर मरीज मौनी मिला, पक्का नीम हकीम ।
पक्का नीम हकीम, कसकता दशक घुटाला ।
ताला मुँह पर जड़ा, खड़ा मुँह बाय दिवाला ।
लूट लूट बस लूट, छूट मक्कारी खाई ।
इक्यानबे हालात, तभी तो पड़े दिखाई ।।





Saturday, 22 September 2012

ताला मुँह पर जड़ा, खड़ा मुँह बाय दिवाला-

करती बंटाधार है, बंटी-बबली टीम ।
मर मरीज मौनी मिला, पक्का नीम हकीम ।
पक्का नीम हकीम, कसकता दशक घुटाला ।
ताला मुँह पर जड़ा, खड़ा मुँह बाय दिवाला ।
लूट लूट बस लूट, छूट मक्कारी खाई ।
इक्यानबे हालात, तभी तो पड़े दिखाई ।।

इक्यान्नबे में -

इक्यान्नबे में बाबू जी की बिगड़ी नई दुकान ।
पाँच भाइयों के चक्कर में, हुआ बड़ा नुक्सान ।

चीनी मैदा तेल कोयला, बेसन घी मजदूरी ।
नाड़ू अपनी जेब भर रहे, मोहन करते दान ।
 भट्ठी का कोयला ख़तम, दूरभाष पर बातें -
ख़तम नहीं राजा भैया की, भाभी भी हैरान ।

नौकर चाकर रहे चुराते, अपना हिस्सा खूब-
बूढी मैया मामा के घर, बन जाती मेहमान ।
आखिर डूबी नई दुकनिया, नौ सालों का धोखा 
बाबू जी को पड़ा बेचना, अपना बड़ा मकान ।।

चुकता करे लगान, विदेशी खाद उर्वरक-

 पैसा पा'के  पेड़ पर, रुपया कोल खदान ।
किन्तु उधारीकरण से, चुकता करे लगान ।
चुकता करे लगान, विदेशी खाद उर्वरक ।
जब मजदूर किसान, करेगा मेहनत भरसक ।
पर मण्डी मुहताज, उन्हीं की रहे हमेशा ।
लागत नहीं वसूल, वसूलें वो तो पैसा ।।

भैया-बहना बांधते, मोहन रक्षा-सूत्र-

दीदी-दादा तानते, कुर्सी वो मजबूत ।
भैया-बहना बांधते, मोहन रक्षा-सूत्र ।
मोहन रक्षा-सूत्र, सकल यू पी भरमाया ।
जीवन भर बंगाल,  कहीं मुंबई  कमाया ।
एफ़ डी आई, तेल, सिलिंडर काटे कौवा ।
साम्प्रदायिक संघ, हुआ हिंदू ही हौव्वा ।

इक्यान्नबे में -

इक्यान्नबे में बाबू जी की बिगड़ी नई दुकान ।
पाँच भाइयों के चक्कर में, हुआ बड़ा नुक्सान ।

चीनी मैदा तेल कोयला, बेसन घी मजदूरी ।
नाड़ू अपनी जेब भर रहे, मोहन करते दान ।
 भट्ठी का कोयला ख़तम, दूरभाष पर बातें -
ख़तम नहीं राजा भैया की, भाभी भी हैरान ।

नौकर चाकर रहे चुराते, अपना हिस्सा खूब-
बूढी मैया मामा के घर, बन जाती मेहमान ।
आखिर डूबी नई दुकनिया, नौ सालों का धोखा 
बाबू जी को पड़ा बेचना, अपना बड़ा मकान ।।

चुकता करे लगान, विदेशी खाद उर्वरक-

 पैसा पा'के  पेड़ पर, रुपया कोल खदान ।
किन्तु उधारीकरण से, चुकता करे लगान ।
चुकता करे लगान, विदेशी खाद उर्वरक ।
जब मजदूर किसान, करेगा मेहनत भरसक ।
पर मण्डी मुहताज, उन्हीं की रहे हमेशा ।
लागत नहीं वसूल, वसूलें वो तो पैसा ।।

भैया-बहना बांधते, मोहन रक्षा-सूत्र-

दीदी-दादा तानते, कुर्सी वो मजबूत ।
भैया-बहना बांधते, मोहन रक्षा-सूत्र ।
मोहन रक्षा-सूत्र, सकल यू पी भरमाया ।
जीवन भर बंगाल,  कहीं मुंबई  कमाया ।
एफ़ डी आई, तेल, सिलिंडर काटे कौवा ।
साम्प्रदायिक संघ, हुआ हिंदू ही हौव्वा ।

Friday, 21 September 2012

हांड़-मांस को बेंच, अश्रु ही पी पाएगी

भागें भगवन भक्त से, भड़भूजे से अन्न |
फास्ट फूड की फेहरिश्त, फिर फांके संपन्न |

फिर फांके संपन्न, नहीं ईश्वर से डरते |
बड़ा चढ़ावा भेंट, देख शिर्डी में करते |

रोटी से मजबूर, गरीबी क्या खाएगी |
हांड़-मांस को बेंच, अश्रु ही पी पाएगी ||

Wednesday, 19 September 2012

ISM धनबाद में एक हफ्ते में दो हृदय विदारक घटनाएं -


हाड़-तोड़ मेहनत  करें, पास करें इम्तिहान ।
I I T से आय के, खुद ले अपनी जान ।

खुद ले अपनी जान, मुहब्बत में इकतरफा ।
मात पिता को रोज, मारता तड़पा तड़पा ।

दूजी घटना  घटित, लड़ी बाइक कुछ ऐसी ।
डेथ हो गई तुरंत,  रहे रो सभी हितैषी ।।

 
तेजा की बाइक चले, बिन  'हेलमेट'  के तेज ।
मीलों ऑफिस बाप का, आता झट से भेज ।

आता झट से भेज,  जाय हरदिन चौराहे ।
 बाहर *भेजा बाप, ^लेट ना होना चाहे ।

बाइक जाती फिसल, निकलता बाहर *भेजा ।
अस्पताल को ^लेट,  ^लेट हो जाता तेजा ।। 


 

बढ़िया बढ़िया किन्तु, तर्क से हारे बढ़िया-

बढ़िया घटिया पर बहस, बढ़िया जाए हार |
घटिया पहने हार को, छाती रहा उभार | 

छाती रहा उभार, दूर की लाया कौड़ी  |
करे सटीक प्रहार, दलीले भौड़ी भौड़ी |

तर्कशास्त्र की जीत, हारता मूर्ख गड़रिया |
बढ़िया बढ़िया किन्तु, तर्क से हारे बढ़िया ||



मेरे सुपुत्र का ब्लॉग 

आज के व्यंजन

kush  
सोते कवि को दे जगा, गैस सिलिंडर आज ।
असम जला, बादल फटा, गरजा बरसा राज ।
गरजा बरसा राज, फैसला पर सरकारी ।
मार पेट पर लात, करे हम से गद्दारी ।
कवि "कुश" जाते जाग, पुत्र रविकर के प्यारे ।
ईश्वर बिन अब कौन,  यहाँ हालात सुधारे ।।

Tuesday, 18 September 2012

अस्पताल को ^लेट, ^लेट हो जाता तेजा-

 
तेजा की बाइक चले, बिन  'हेलमेट'  के तेज ।
मीलों ऑफिस बाप का, आता झट से भेज ।

आता झट से भेज,  जाय हरदिन चौराहे ।
 बाहर *भेजा बाप, ^लेट ना होना चाहे ।

बाइक जाती फिसल, निकलता बाहर *भेजा ।
अस्पताल को ^लेट,  ^लेट हो जाता तेजा ।। 


 

मोहन की जसुमति खफा, मिले दूसरी धाय-

ममता कम होती गई, रही सही भी जाय |
मोहन की जसुमति खफा, मिले दूसरी धाय |

मिले दूसरी धाय, देवकी तो है जिन्दा |
टाल अलाय बलाय, उड़ेगा अभी परिन्दा |

मँहगाई गठजोड़, गगन में हरदम रमता |
ऊंचा ऊंचा उड़े, नहीं धरती से ममता ||

Monday, 17 September 2012

कपड़ा कंघी झाड़ मत, पथ का कूड़ा झाड़-

 अधिक से अधिक संख्या में शामिल होकर 

इस संवेदनशील विषय पर  

छंद रचें -

और नकद पुरस्कार प्राप्त करें-

रविकर 

'चित्र से काव्य तक' प्रतियोगिता अंक १८ 

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सींक-सिलाई कन्यका, सींक सिलाई बाँध ।
गठबंधन हो दंड से, कूड़ा-करकट साँध ।

जब पानी पोखर-हरा, कहाँ खरहरा शुद्ध ।
नलके से धो ले इसे, फिर होगा न रुद्ध ।

डेढ़ हाथ की तू सखी, छुई मुई सी  बेल ।
पांच हाथ का दंड यह, कैसे लेती झेल ?? 

अब्बू-हार बिसार के, दब्बू-हार बुहार ।
वे तो पड़े बुखार में, खाए मैया खार ।। 

कपड़ा कंघी झाड़ मत, पथ का कूड़ा झाड़ ।
टूटा तेरे जन्मते, कुल पर बड़ा पहाड़ ।।

 झाड़ू थामे हाथ दो, करते दो दो हाथ ।
हाथ धो चुकी पाठ से, सफा करे कुल पाथ ।
 
  सड़ा गला सा गटर जग, कन्या रहे सचेत ।
खुल न जाए खलु हटकि, खलु डाले ना  रेत ।

करते मटियामेट शठ, नीति नियंता नोच ।
जांचे कन्या भ्रूण खलु, मारे नि:संकोच ।।
सींक-सिलाई =1. दुबली-पतली / झाड़ू की सींक 
पोखर = तालाब 
खरहरा = झाड़ू 
रुद्ध = रुकावट 
कपड़ा कंघी झाड़=पहनना -संवरना  
झाड़  = सफाई करना  
खलु = दुष्ट 
रेत = बालू -मिटटी से तात्पर्य 
रेत =  रेतना / काटना

Friday, 14 September 2012

अन्दर लिखते सीन, करें बाहर सब नाटक-

मची हाय-तोबा विकट, सड़कों पर कुहराम |
राम नाम ही सत्य है, करे प्रदर्शन जाम |

करे प्रदर्शन जाम, कहा की है यह ताकत |
ताकत माया बाम, मुलायम ममता झाँकत |

अन्दर लिखते सीन, करें बाहर सब नाटक |
शतक पाप शिशुपाल, नहीं न, गर्दन काटत ||


पैदा खुदरा पूत, आठवां कृष्णा नामा-रविकर

सुवन सातवाँ सिलिंडर, माया लड़की रूप ।
छूट उड़ी आकाश की, वाणी सुन रे भूप ।
वाणी सुन रे भूप, कंस कंगरसिया मामा।
पैदा खुदरा पूत, आठवां कृष्णा नामा ।
लेगा तेरे प्राण, यही वह पुत्र आठवाँ ।
किचेन देवकी जेल, कहे है सुवन सातवाँ ।।

सिली सिलिंडर सनसनी, मेहरबान मक्कार  |
प्रोसेस्ड खाने का करे, अब प्रचार
सरकार |

अब प्रचार
सरकार, पुरातन भोजन भूलो |
पाक कला त्यौहार, भूल कर केक कुबूलो |

फास्ट फूड भरमार, तरीके नए सोचिये |
पाई फुर्सत नारि, सतत अब नहीं कोंचिये ||


गैस सिलिंडर चलेगा पूरे दो महीने : है न उपाय-

 दाने खा लो अंकुरित, पी लो सत्तू घोल ।
पाव पाइए प्रेम से, ब्रेड पैकेट लो मोल ।
ब्रेड पैकेट लो मोल, लंच में माड़-भात खा ।
काटो मस्त सलाद, शाम को मूढ़ी चक्खा । 
चाय बना इक बार, डालिए  हॉट पॉट में ।
फास्ट फूड दो मिनट, पकाओ एक लाट में ।।


आशा है मेहमान की, होना नहीं निराश ।
खिला बताशा दे पिला, पानी बेहद ख़ास ।
पानी बेहद ख़ास, पार्टी उससे मांगो ।
करिए ढाबा विजिट, शाम को बाहर भागो ।
ख़तम होय न गैस, गैस काया में पालो ।
न तलना ना भून, सदा हर चीज उबालो  ।।

मा मू ली   बा पु-रा-जमा, जल डी-जल जंजाल ।
गैस सिलिंडर सातवाँ, छील बाल की खाल ।
छील बाल की खाल, सुबह का हुआ नाश्ता ।
चार चने की दाल, लंच में चले पाश्ता ।
फास्ट फूड ब्रेड जैम,  किचेन माता जी भूली ।
मूली गाजर काट,  बने  मुश्किल  मामूली ।

आग लगे डीजल जले, तले *पकौड़ी पन्त -

चाटुकार *चंडालिनी, चले चाट सामन्त । 
आग लगे डीजल जले, तले *पकौड़ी पन्त ।

तले पकौड़ी पन्त, कीर्ति मँहगाई गाई ।
गैस सिलिन्डर ख़त्म, *कोयले की अधमाई ।

*इडली अल्पाहार, कराये भोजन *जिंदल ।
इटली *पीजा रात, मनाते मोहन मंगल ।।
प्रश्न : तारांकित शब्दों के अर्थ बताएं ।।

बने नहीं पर न्यूज, लाख मारे मँहगाई

बावन शिशु हरदिन मरें, बड़ा भयंकर रोग ।
खाईं में जो बस गिरी, उसमें बासठ लोग ।

उसमें बासठ लोग, नाव गंगा में डूबी ।
दंगे मार हजार, पुलिस नक्सल बाखूबी ।

गिरते कन्या भ्रूण, पड़े अब खूब दिखाई ।
बने नहीं पर न्यूज, लाख मारे मँहगाई ।। 

लेकिन दर्पण अगर, दिखा दो इसको कोई-

मगन मना मानव मुआ, याद्दाश्त कमजोर |
लप्पड़ थप्पड़ छड़ी अब, चाबुक रहा खखोर |

चाबुक रहा खखोर, बड़ी यह चमड़ी मोटी  |
न कसाब न गुरू, घुटाला हाला घोटी |

लेकिन दर्पण अगर, दिखा दो इसको कोई |
भौंक भौंक मर जाय, लाश पर लज्जा रोई ||

प्रोसेस्ड खाने का करे, अब प्रचार सरकार-

सिली सिलिंडर सनसनी, मेहरबान मक्कार  |
प्रोसेस्ड खाने का करे, अब प्रचार
सरकार |

अब प्रचार
सरकार, पुरातन भोजन भूलो |
पाक कला त्यौहार, भूल कर केक कुबूलो |

फास्ट फूड भरमार, तरीके नए सोचिये |
पाई फुर्सत नारि, सतत अब नहीं कोंचिये ||


गैस सिलिंडर चलेगा पूरे दो महीने : है न उपाय-

 दाने खा लो अंकुरित, पी लो सत्तू घोल ।
पाव पाइए प्रेम से, ब्रेड पैकेट लो मोल ।
ब्रेड पैकेट लो मोल, लंच में माड़-भात खा ।
काटो मस्त सलाद, शाम को मूढ़ी चक्खा । 
चाय बना इक बार, डालिए  हॉट पॉट में ।
फास्ट फूड दो मिनट, पकाओ एक लाट में ।।


आशा है मेहमान की, होना नहीं निराश ।
खिला बताशा दे पिला, पानी बेहद ख़ास ।
पानी बेहद ख़ास, पार्टी उससे मांगो ।
करिए ढाबा विजिट, शाम को बाहर भागो ।
ख़तम होय न गैस, गैस काया में पालो ।
न तलना ना भून, सदा हर चीज उबालो  ।।

मा मू ली   बा पु-रा-जमा, जल डी-जल जंजाल ।
गैस सिलिंडर सातवाँ, छील बाल की खाल ।
छील बाल की खाल, सुबह का हुआ नाश्ता ।
चार चने की दाल, लंच में चले पाश्ता ।
फास्ट फूड ब्रेड जैम,  किचेन माता जी भूली ।
मूली गाजर काट,  बने  मुश्किल  मामूली ।

आग लगे डीजल जले, तले *पकौड़ी पन्त -

चाटुकार *चंडालिनी, चले चाट सामन्त । 
आग लगे डीजल जले, तले *पकौड़ी पन्त ।

तले पकौड़ी पन्त, कीर्ति मँहगाई गाई ।
गैस सिलिन्डर ख़त्म, *कोयले की अधमाई ।

*इडली अल्पाहार, कराये भोजन *जिंदल ।
इटली *पीजा रात, मनाते मोहन मंगल ।।
प्रश्न : तारांकित शब्दों के अर्थ बताएं ।।

बने नहीं पर न्यूज, लाख मारे मँहगाई

बावन शिशु हरदिन मरें, बड़ा भयंकर रोग ।
खाईं में जो बस गिरी, उसमें बासठ लोग ।

उसमें बासठ लोग, नाव गंगा में डूबी ।
दंगे मार हजार, पुलिस नक्सल बाखूबी ।

गिरते कन्या भ्रूण, पड़े अब खूब दिखाई ।
बने नहीं पर न्यूज, लाख मारे मँहगाई ।।

Thursday, 13 September 2012

आग लगे डीजल जले, तले *पकौड़ी पन्त -

चाटुकार *चंडालिनी, चले चाट सामन्त । 
आग लगे डीजल जले, तले *पकौड़ी पन्त ।

तले पकौड़ी पन्त, कीर्ति मँहगाई गाई ।
गैस सिलिन्डर ख़त्म, *कोयले की अधमाई ।

*इडली अल्पाहार, कराये भोजन *जिंदल ।
इटली *पीजा रात, मनाते मोहन मंगल ।।
प्रश्न : तारांकित शब्दों के अर्थ बताएं ।।

Tuesday, 11 September 2012

मेरे सपनों का भारत

सपनों का भारत दिखे, लिखे मुँगेरी लाल |
रुपिया बरसे खेत में, घर में मुर्गी दाल |
घर में मुर्गी दाल, चाल सब चलें पुरातन |
जर जमीन जंजाल, बजे हर घर में बरतन |
चचा भतीजावाद, राज भी हो अपनों का |
बझा रहे हर जंतु, यही भारत सपनों का ||


भीड़ घटे श्मशान में, हस्पताल में रोग ।
दारुण दुर्घटना घटे, सदा घटे संजोग ।
सदा घटे संजोग, भ्रूण हत्या ना होवे।
हो दहेज़ अब बंद,  कहीं कुत्ता ना रोवे ।
देखे रविकर स्वप्न, ध्वस्त दुश्मन-मनसूबे ।
सूबे सब खुशहाल, नहीं जी डी पी  डूबे ।।
 

Sunday, 9 September 2012

O B O : मेरे सपनों का भारत - रविकर की टिप्पणियां


(1)
आदरणीय अम्बरीश जी और अरुण निगम जी की युगलबंदी पर 
( प्रशंसा करने का यह तरीका : कहीं गलत तो नहीं )

 दारुण दोहा दत्तवर, दिया दाद  दिल-दाध  ।
अरुण अशठ अमरीश अध , अवली असल अबाध ।
अवली असल अबाध, पुन: रोला जुड़ जाते ।
चढ़ा करेला नीम, देख रविकर घबराते ।
युगलबंद हो बंद, सुनो स्वर रविकर कारुण ।
हे आयोजक वृन्द, घटाओ लेबल दारुण ।। 
भावार्थ : जैसा मैंने सोचा 
 दारुण दोहा दत्तवर, दिया दाद  दिल-दाध  ।
हे ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त,  प्रचण्ड दोहे पर मैं दाद देता हूँ, और दिल में ईर्ष्या भी रखता हूँ ।
 (दोहा के रचनाकार अम्बरीश जी) 
अरुण अशठ अमरीश अध , अवली असल अबाध ।
(कृपया अध को अघ न पढ़ें)
सज्जन अरुण और अमरीश ने  आधी आधी (अध) पंक्ति (अवली ) 
जो उन्मुक्त ओर वास्तविक हैं (रची हैं )
पहली पंक्ति में अम्बरीश जी के लिए विशेषण दत्तवर प्रयुक्त हो चुका  है 
इसलिए दुबारा जरुरत नहीं है 
 अवली असल अबाध, पुन: रोला जुड़ जाते ।
पहले, दोहे आदरणीय अम्बरीश जी ने रचे  फिर उनपर रोले लिखे गए 
चढ़ा करेला नीम, देख रविकर घबराते ।
अरुण निगम जी मेरे परम मित्र हैं-
उनसे पहले ही चर्चा हो चुकी थी इन रोले छंद की ।
उनका अनुरोध था की कुछ टिपण्णी की जाए ।।
दोहरी सुन्दरता देखकर रविकर घबरा रहा है । 
(क्योंकि वह इतनी सुन्दर रचना करने में सक्षम नहीं है- ईर्ष्या के वशीभूत कहा  जा रहा है )
युगलबंद हो बंद, सुनो स्वर रविकर कारुण ।
हे आयोजक वृन्द, घटाओ लेबल दारुण ।। 
इतनी श्रेष्ठ रचना और युगल बंदी देख कर 
रविकर ईर्ष्या वश यह युगलबंदी बंद करने के लिए आयोजक गण से गुहार लगाता है-


(2)
मेरे सपनों के भारत में, दुश्मन सेंध लगाते  देखा ।
अपनी मिटटी का बन्दा ही,  मिटटी वहां हटाते देखा ।
चोरी की जो रपट लिखाई, सज्जन को रपटाते देखा ।
गलबहियां दुर्जन के संग में, अपनों को हकलाते देखा ।।

(3)
मेरे मुल्क महान में, मार मजा मक्कार ।
समाधान सपना सजा, सूत्र सजा सरकार ।
सूत्र सजा सरकार, संज्ञ सत्ता संक्रामक ।
संतर्जन संघर्ष, संधिचौरक संभ्रामक ।
रविकर का सद-स्वप्न, दु :शासन मिटे घनेरे ।
भारत बने महान, देशवासी खुश मेरे।

(4)

 पहले पहले प्यार पर, प्रतिकामिनि प्रतिहार ।
प्रत्यर्चन पर पैंतरे, पैना पृष्ठ प्रहार ।
पैना पृष्ठ प्रहार, परोसी परसु परोसे ।
भग्गुल भक भकुवान, भागता भाग्य भरोसे ।
टूटा फूटा स्वप्न,  कुण्डली रविकर कहले ।
रहिये युवा सचेत, प्यार मत करना पहले ।।

(5)
फटेहाल कटु कोयला, कितने काले केस ।
नहलाओ बेसन मलो, बोलो नहीं विशेष ।।
 
रेवड़ियाँ सब लूटते, माँ की क्या परवाह ।
गोरी के वे पूत सब,  करे सौतिया डाह ।।
 
सर्फ़ यूरिया दूध में, बढे मिलावट खोर ।
खुशबु क्या भकरांध है, मार रहे मुँह ढोर ।।
 
कृषक आत्म-हन्ता हुवे, छोडो उनका ख्याल ।
सोलह दिन से रहे जल, एम पी का क्या हाल ।।
 
  स्वर सुनना सबसे कठिन, संसद सत्ता मौन ।
भैंस बजाये बीन तो, हो बिटिया का गौन ।।
 
रोम रोम इ-टिली लिली , रोम पोप का लैंड ।
खड़ी खाट कर के चले, स्वप्न भूल हा-लैंड ।।

(6)
हर दम दम भर दंगे देखे ।
अरबों भूखे नंगे देखे ।
बेईमान चालाक चोर ठग
खुशहाली में चंगे देखे ।।

देश भक्त को ठंडा पाया ।
सज्जन को पाया घबराया ।
दुर्जन चैन छीनता देखा -
जिस पर है सत्ता का साया ।
 (7)
बन्दों पर होगी पाबन्दी, पा बन्दी चंडी बिंदास |
सजा-याफ्ता सा घर साजूँ, बीबी की सुन सुन बकवास |
तफरी-तबियत तुनुक-मिजाजी, तनातनी उडती उपहास |
बकवाये बेमतलब में नित, डाले न थोड़ी भी घास  ||
 (8)

इतनी धाकड़ हो चुकी, जब भैया शुरुवात |
कैसे खुरपेंची करें, अपनी क्या औकात ?
अपनी क्या औकात, उमा अविनाशी बागी |
जब अशोक संदीप, प्रभाकर जी अनुरागी |
रविकर दुनिया नित्य, इसे आदर से देखे |
भारत मेरा स्वप्न, चले जग इसके लेखे ||
(9)
शामिल पहली मर्तबा,  पाया  मजा विशेष ।
आयोजक आभार है, शुभकामना अशेष ।
शुभकामना अशेष, तुरन्ती कई लिखाई ।
बना श्रेष्ठ माहौल, तबीयत फिर मचलाई ।
घर के झंझट भूल, ताकता कवि गण काबिल ।
रविकर का सौभाग्य, मस्त तन्मय वह शामिल ।।


यह भी 

मेरे सपनों के भारत में, मोटा मोटा कोटा होगा-

करते वे तफरीह, ढूँढती माँ को मोटर-

 मोटर में लिख घूमते, माँ का आशिर्वाद ।
जय माता दी बोलते, नित पावन अरदास ।


नित पावन अरदास, निकल माँ बाहर घर से ।
रोटी को मुहताज, कफ़न की खातिर तरसे ।


कह रविकर पगलाय, कहीं खाती माँ ठोकर ।
करते वे तफरीह, ढूँढती माँ को मोटर ।। 



Thursday, 6 September 2012

माँ मोहन के पास, बॉस श्रीकांत हमारे-

सचिन सांसद आ गए, खेलें क्रिकेट खेल  |
टेस्ट मैच में हुए जो, तीन मर्तवा फेल |

तीन मर्तवा फेल, रिटायर क्यूँ हो जाए |
फेल हुवे नौ साल, पहल मोहन से आए |

माँ मोहन के पास, बॉस श्रीकांत हमारे |
है संसद का साथ, भले गर्दिश में तारे ||

Wednesday, 5 September 2012

चन्द्रगुप्त देने को आतुर अपना अंग-प्रत्यंग -

 एकलव्य ने दिया अंगूठा, खुद से हुआ अपंग ।
द्रोण सरीखे गुरू हमेशा हैं सत्ता के संग ।
 
गिरगिटान सा रहे बदलते, शासक हरदम रंग ।
गाँव-राँव  की विकट परिस्थिति, शिक्षक चिन्तक दंग ।
 
लैप-टॉप की टॉफी से कर रहे तपस्या भंग ।
अधकचरी यह चुकी व्यवस्था, करते शोषक तंग ।
 
 घूम रही आधी आबादी, अब भी नंग धडंग ।
मानवता को लड़नी होगी फिर से तगड़ी जंग ।।
 
चन्द्रगुप्त देने को आतुर अपना अंग-प्रत्यंग ।
चाह एक चाणक्य बना ले, मुख्य धार का अंग ।

Monday, 3 September 2012

रविकर-पत्नी किन्तु, हड़पती कुल कंगालों-


सालों घर को सजा के, सजा भोगती अन्त । 
रक्त-मांस सर्वस्व दे, जो जीवन पर्यंत ।

जो जीवन पर्यंत, उसे वेतन का हिस्सा ।
लाएगी सरकार, नया बिल ताजा किस्सा ।

रविकर-पत्नी किन्तु,  हड़पती कुल कंगालों ।
 कुछ तो करो उपाय,  एक बिल लाना सालों ।।

लिख लिख कालिख कोल, जवाबों में कंजूसी-

Sonia approaches Mulayam in House, raises eyebrows


कानाफूसी दो मिनट, खुश खुश हाय-कमान ।
फुस-फुस  "N D A " हुआ, पहलवान पटियान ।

पहलवान पटियान, पटाया बाम मोर्चा ।
इत्मिनान हुक्काम, होय संसद में चर्चा ।

लिख लिख कालिख कोल, जवाबों में कंजूसी ।
अगर ढोल  न पोल, किया क्यों काना-फूसी ।।

Sunday, 2 September 2012

पर रविकर व्यक्तव्य, सुने न लम्पट ब्लॉगर -

परिकल्पना समारोह-अंतिम सत्र : 

नव-मीडिया दशा, दिशा एवं दृष्टि 

पर 

रविकर

 
(1)
  D N A, टीकाकरण, सम्यक आविष्कार | 
गाड-पार्टिकल सरिस ही, असरदार  संचार |
असरदार  संचार, सरस मानव का जीवन |
दिन प्रति दिन का सार, करे पक्का गठबंधन |
नश्वर जीवन आज, लगे इसके बिन  फीका |
जयतु तार बेतार, करे क्या कोई  टीका--
(2)
मेनी टू मेनी  हुआ,  नव मीडिया दुरुस्त ।
नैनो सा चंचल चपल, कालजीत सा चुस्त ।
कालजीत सा चुस्त, दशा पौगंड दिखाया ।
गर्भ जन्म फिर बाल्य, सफल कौमार्य बिताया ।
बीत रहा पौगंड, मस्त यौवन की बारी ।
रखे मीडिया होश, छाय ना जाय खुमारी ।।

 (3)
दसों दिशा में छा रहा, अविरल सरस प्रवाह ।
सकल घटक अनुभव करें, जब अदम्य उत्साह ।
जब अदम्य उत्साह, राह में रहजन लूटे ।
फैलाए अफवाह, पलायन धंधा छूटे ।
किया सरल संचार, हमेशा मानव जीवन ।
दुरुपयोग कर दुष्ट, मान का करते मर्दन ।।

 (4)
दिव्य दृष्टि नव-मीडिया, दर्शन कक्षा श्रेष्ठ ।
शुद्ध चित्त से आकलन, प्रस्तुत विवरण ठेठ ।
प्रस्तुत विवरण ठेठ, मिलावट नहीं करे है ।
*जैसी चादर दीन्ह, उतारे शुद्ध धरे है ।
निरहू-घिरहू फिल्म, खेल सत्ता संसाधन ।
शिक्षा सेहत ढोंग, आपदा दंगा चिंतन ।।
(5)
प्राकृतिक घटना विविध, इंटरनेट संचार ।
साइबर कल्चर से जुड़ा, आन-लइन व्यवहार ।
आन-लइन व्यवहार, मस्त ब्लागिंग भी शामिल ।
मल्टी-प्लेयर गेम, जमाये नेट पर महफ़िल ।
नव-मीडिया जुड़ाव, किन्तु कल्चर से ज्यादा ।
दूरदर्श-दृष्टांत, रीतियों से भी वादा ।।

(6)
वितरण करे नुमाइशी, नव-कम्पू तकनीक ।
सांस्कृतिक यह विम्ब है, नव मीडिया सटीक ।
नव मीडिया सटीक, तेज है अच्छा ख़ासा ।
वर्ष गुजरते देर, बदल जाती परिभाषा ।
इक प्रस्तुति के विविध, बना लें लाखों उत्था ।
सॉफ्टवियर संस्कृति, हुवे यूँ गुत्थम-गुत्था ।। 
(7)
गति बढती अवकलन की, बढे सौन्दर्य साज ।
नवल मिडिया करे नित, अलंकरण पर नाज ।
अलंकरण पर नाज, मीडिया मेटा-मीडिया ।
विषय-वस्तु है एक, सैकड़ों नए आइडिया ।
लाइफ-लाइन-रेल, नहीं पटरी से उतरे ।
हो इंजन न फेल, बड़े भारी हैं खतरे ।। 
 यह अलग से-
ब्लॉगर अल-बल बोलता, बला-अगर बकवाय ।
पक्का श्रोता टायपिस्ट, आये खाये जाय ।
आये खाये जाय, सर्प सा सीध सयाना ।
कहे गधे को बाप, कुंडली मार बकाना ।
अपनी अपनी सुना, भगे कवि जौ-जौ आगर  ।
पर रविकर व्यक्तव्य, सुने न लम्पट ब्लॉगर ।।