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Sunday, 14 October 2018

शेष दोहे

साथ जिंदगी के चले, काबिलियत किरदार।
दोनों से क्रमशः मिले, लक्ष्य सुकीर्ति-अपार।।

जीत अनैतिकता रही, रिश्ते हुए स्वछंद।
लंद-फंद छलछंदता, हैं  हौसले बुलंद।।

दुश्मन घुसा दिमाग में, करे नियंत्रित सोच।
जगह दीजिए दोस्त को, दिल में नि:संकोच।।

क्यूं दिमाग में घेरता, दुश्मन ज्यादा ठौर।
शुभचिन्तक दिल में बसे, जगह दीजिए और।।

हिचक बनी अब हिचकियाँ, मन हिचकोले खाय।
खोले मन का भेद तो, बिखर जिंदगी जाय।।

हिचक बनेगी हिचकियाँ, ले जायेगा गैर।
इधर बचेंगी सिसकियॉ, सतत् मनाती खैर।।

इक्का मिला यकीन का, मित्र खोजना बंद |
किन्तु भरोसे के मिलें, फिर भी जोकर चंद ||

जीवन में बदलाव हित, अवसर मिले अनेक |
समय बदलने के लिए, जीवन-अवसर एक ||

सराहना प्रेरित करे, आलोचना सुधार।
निंदक दो दर्जन रखो, किन्तु प्रशंसक चार।

वही शब्द दुख बाँटता, वही शब्द दे हर्ष।
समय परिस्थिति भाव से, निकल रहा निष्कर्ष।।

फल मन के विपरीत यदि, हरि-इच्छा कह भूल।
किन्तु मान ले हरिकृपा, यदि मन के अनुकूल।

कभी नहीं आती मुझे, रविकर तेरी याद।
पहले ही तू कर चुकी, याददाश्त बरबाद।।

शनैः शनैः रविकर चढ़े, कुछ रिश्तों पर रंग।
शनैः शनैः कलई खुले, शनैः शनैः कुछ भंग।।

सत्य सादगी स्वयं ही, रखते अपना ख्याल।
ढकोसला हित झूठ हित, खर्च कीजिए माल।।

तेरे हर गुरु से रहा, ज्यों मैं सदा सचेत।
मेरे शिष्यों से रहो, त्यों ही तुम-समवेत्।।

अगर उपस्थिति आपकी, ला सकती मुस्कान।
समझो सार्थक जिंदगी, सच में आप महान।।

आतप-आपद् में पड़े, हीरा-कॉच समान।
कॉच गर्म होता दिखा, हीरा-मन मुस्कान।

रहे प्रेम की प्रेरणा, राह दिखाये ज्ञान।
तो समझो जीवन सफल, भली करें भगवान.।।

बना घरौंदे रेत के, करे प्रेम आराम।
करे घृणा का ज्वार तब, रविकर काम-तमाम।।

रविकर हर व्यक्तव्य का, करे सदा सत्कार।
श्लाघा देती प्रेरणा, निंदा करे सुधार।।

सारे दुष्कर कार्य कर, जमा रही वो पैर।
माथे पर बिन्दी लगा, रही नदी में तैर।।

अग्रेसर करता खड़े, कहाँ कभी अवरोध।
जो बाधा पैदा करें, करो न उनपर क्रोध।

कभी पकड़ने क्यों पड़ें, तुम्हें गैर के पैर।
पकड़ गुरू के हाथ को, कर दुनिया की सैर।।

पल्ले भी मिलते गले, घरभर में था प्यार।
अब एकाकी कक्ष सब, सदमें में दीवार।।

पढ़े-बढ़े बेटी बचे, बदला किन्तु बिधान।
वंश-वृद्धि हित अब बचा, रविकर हर संतान।।

जो बिन देखे आइना, लगे बरसने आज।
जिरह-बगावत-फैसला, कर बैठे अल्फाज ||

चंद-चुनिंदा मित्र रख, जिन्दा शौक तमाम।
ठहरेगी बढ़ती उमर, रश्क करेंगे आम।।

पीड़ित दुहराता रहे, वही समस्या रोज।
निराकरण नायक करे, समुचित उत्तर खोज।।

निंदा की कर अनसुनी, बढ़ मंजिल की ओर।
मंजिल मिलते ही रुके, बेमतलब का शोर।।

खोल हवा की गाँठ जब, चिड़िया चुगती खेत।
दिल बैठा खिल्ली उड़ी, रविकर हुआ अचेत।।

प्रभु से माँगे भीख फिर, करे दान नादान।
शिलापट्ट पर नाम लिख, गर्व करे इन्सान।।

पीछे पीछे वक्त के, भाग रहा अनुरक्त।
पकड़ न पाया वह कभी, और न पलटा वक्त।

करे हथेली कर्म तो, बदलेगी तकदीर।
मुट्ठी भींचे व्यर्थ ही, रविकर भाग्य-लकीर।।

जब भी खींचे जिंदगी, हट पीछे निर्भीक।
वेधेगी वह तीर सा, निश्चय लक्ष्य सटीक।।

श्रेय नहीं मिलता अगर, चिंता करो न तात।
करो काम निष्काम तुम, मिले स्वयं-सौगात।

चाह नहीं बदलाव की, शक्ति न पाये पार।
तो पेचीदा जिंदगी, जस की तस स्वीकार।।

पीछे-पीछे वक्त के, रहा भागता भक्त।
पकड़ न पाया वह कभी, पलट न पाया वक्त।।

जिरह-बगावत-फैसला, कर बैठे अल्फाज।
क्यों बिन देखे आइना, बाहर निकले आज।।

किसे सुनाने के लिए, ऊँची की आवाज।
कर ऊँचा व्यक्तित्व तो, सुने अवश्य समाज।।

नोटों की गड्डी खरी, ले खरीद हर माल।
किन्तु भाग्य परखा गया, सिक्का एक उछाल।।

भले कभी जाता नहीं, पैसा ऊपर साथ।
लेकिन धरती पर करे, रविकर ऊँचा माथ।।

प्रभु से माँगे भीख फिर, करे दान नादान।
शिलापट्ट पर नाम लिख, गर्व करे इन्सान।।

रे रविकर यूँ ठेल मत, पट बाहर की ओर।
खुशियाँ तो अंदर पड़ी, झट-पट-खोल, बटोर।।

करती गर्व विशिष्टता, अगर शिष्टता छोड़।
क्या विशिष्ट अंदर भरा, देख खोपड़ी तोड़।।

बासी-मुँह पढ़कर मनुज, जिसको दिया बिसार।
कीमत जाने वक्त की, रविकर वह अखबार।

माथे पर बिंदी सजा, रही नदी में तैर।
करें बेटियाँ आजकल, आसमान तक सैर।।

पकड़ गुरू का हाथ तू, कर दुनिया की सैर।।
कभी पकड़ने क्यों पड़े, फिर गैरों के पैर।।

तरु-शाखा कमजोर, पर, गुरु-पर, पर है नाज ।
कभी नहीं नीचे गिरे, छुवे गगन परवाज ।।

राजनीति पर कर बहस, कभी न रिश्ते तोड़।
विपदा में होंगे यही, मददगार बेजोड़।।

कड़ुवे-सच से जब कई, गए सैकड़ों रूठ।
तब जाकर सीखा कहीं, रविकर मीठा-झूठ।।

पकड़ गुरू का हाथ तू, कर दुनिया की सैर।।
कभी पकड़ने क्यों पड़े, फिर गैरों के पैर।।

तरु-शाखा कमजोर, पर, गुरु-पर, पर है नाज ।
कभी नहीं नीचे गिरे, छुवे गगन परवाज ।।


रफ़्ता रफ़्ता जिन्दगी, चली मौत की ओर।
रोओ या विहँसो-हँसो, वह तो रही अगोर।।

प्रश्नपत्र सी जिन्दगी, विषयवस्तु अज्ञात।
हर उत्तर उगलो तुरत, वरना खाओ मात।।

मंडप कहते हैं जिसे, जहाँ मंगलाचार।
करें हिरणियाँ बाघ का, रविकर वहीं शिकार।।

तेरे सा कोई नहीं, कहने से आरम्भ।
बहुतेरे तेरे सरिस, बोल दिखाये दम्भ।।

सुनते हो से हो शुरू, रविकर शादी-ब्याह।
बहरे हो क्या बोलकर, करती वह आगाह।।

कहाँ गई थी तुम प्रिये, देखूँ कब से राह।
कहाँ गई मर बोलता, रविकर लापरवाह।।

तुम तो मिले नसीब से, देखा था उन्माद।
थे नसीब फूटे कहे, रविकर जब अवसाद।।

बीज उगे बिन शोर के, तरुवर गिरे धड़ाम।
सृजन-शक्ति अक्सर सुने, विध्वंसक कुहराम।।

सत्य प्रगट कर स्वयं को, करे प्रतिष्ठित धर्म।
झूठ छुपा फिरता रहे, उद्बेधन बेशर्म।।

दो अवश्य तुम प्रति-क्रिया, दो शर्तिया जवाब।
लेकिन संयम-सभ्यता, का भी रखो हिसाब।।

चींटी से श्रम सीखिए, बगुले से तरकीब।
मकड़ी से कारीगरी, आये लक्ष्य करीब।।

बंद घड़ी भी दे जहाँ, सही समय दो बार।
वहाँ किसी भी वस्तु को, मत कहना बेकार।।1।।

छिद्रान्वेषी मक्खियाँ, करती मन-बहलाव।
छोड़े कंचन-वर्ण को, खोजे रिसते घाव।।2।।

बुरे वक्त में छोड़ के, गये लोग कुछ खास।
रविकर के कृतित्व पर, उनको था विश्वास।।3।।

है जीवन शादीशुदा, ज्यों रविकर कश्मीर।
खूबसूरती है मगर, आतंकित वर-वीर।।

आत्मा भटके, तन मरे, कल-परसों की बात।
तन भटके, आत्मा मरे, रविकर आज हठात।।

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