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Saturday, 14 July 2012

सदा खिलाना गुल नया, नया कजिन मुसकाय -


करे बहाना आलसी,  अश्रु बहाना काम |
होय दुर्दशा देह की,  जब से लगी हराम  ।।

अन्न पकाना छोड़ दी, कान पकाना रोज   |
सास-बहू में पिस रहा, अभिनेता मन खोज ।।

दही जमाना भूलती, रंग जमाना याद |
करे माडलिंग रात-दिन, बढ़ी मित्र तादाद ||

पुत्र खिलाना भाय ना, निकल शाम को जाय |
सदा खिलाना गुल नया,  नया कजिन मुसकाय ||

14 comments:

  1. ...ये कौन परी है?...जरा अता पता तो बताइए रविकर जी!

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  2. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    पर भी पधारेँ।

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  3. Replies
    1. रचना रचना रवि-करे, रचना रची न जाय |
      रचना रविकर थी पड़ी, चला यहाँ चिपकाय ||

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (15-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  5. दही जमाना भूलती, रंग जमाना याद |
    करे माडलिंग रात-दिन, बढ़ी मित्र तादाद ||
    अजी क्या बात है .सजीव कर दियो आधुनिका का चित्र आपने .

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  6. बहुत ही बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग

    विचार बोध
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  7. बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  8. बहुत ही बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग

    विचार बोध
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  9. ये लो अब ये भी कर लिया
    लाल में नीला भर लिया ।

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  10. This comment has been removed by the author.

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  11. पकाना खिलाना छोड़कर,शुरू किया ये काम,
    मिलना जुलना कुछ नही,कमा रहे हो नाम,,,,,,

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  12. करे बहाना आलसी, अश्रु बहाना काम |
    होय दुर्दशा देह की, जब से लगी हराम ।।

    सुंदर दोहे ...!!

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  13. बहुत ही सुन्दर दोहे ...अत्यंत प्रभावी अभिव्यक्ति
    सादर !!!

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