Followers

Tuesday, 16 July 2013

एक अकेला घाव, दिया अपनों ने मिलकर-



सिसकारे बिन सह गया, सत्तर सकल निशान |
उन घावों को था दिया, हमलावर अनजान |

हमलावर अनजान, किन्तु यह घाव भयंकर |
एक अकेला घाव, दिया अपनों ने मिलकर |

प्राणान्तक यह घाव, खाय कर रविकर हारे |
अन्तर दिखता साफ़, आज अन्तर सिसकारे ||

6 comments:

  1. अपनों का कष्ट ही अधिक रहा है ..

    ReplyDelete
  2. अपने तो हर रोज़ मारते हं

    ReplyDelete
  3. बहुत उम्दा,सुंदर सृजन,,,वाह !!! क्या बात है

    RECENT POST : अभी भी आशा है,

    ReplyDelete

  4. प्राणान्तक यह घाव, खाय कर रविकर हारे |
    अन्तर दिखता साफ़, आज अन्तर सिसकारे ||

    इसे ही कहते हैं तदानुभूति दुसरे के दुःख का सहभागी /उपभोक्ता बनना .ॐ शान्ति

    ReplyDelete
  5. आपकी यह रचना कल गुरुवार (18-07-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

    ReplyDelete