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Monday, 1 July 2013

इधर इंद्र उत्पात , उधर इंद्रा का नाती -

बरसाती चेतावनी,  चूक चोचलेबाज |
डूबे चारोधाम जब, चौकन्ना हो राज |

चौकन्ना हो राज, बहाया तिनका तिनका |
गिरा प्रजा पर गाज, नहीं कुछ बिगड़ा इनका |

जल-समाधि जल-व्याधि, बहा मलबा आघाती |
इधर इंद्र उत्पात , उधर इंद्रा का नाती ||


होवे हृदयाघात यदि, नाड़ी में अवरोध ।
पर नदियाँ बाँधी गईं, बिना यथोचित शोध ।

बिना यथोचित शोध, इड़ा पिंगला सुषुम्ना ।
रहे त्रिसोता बाँध, होय क्यों जीवन गुम ना ?

अंधाधुंध विकास, पड़ी प्रायश्चित रोवे ।
भौतिक सुख की ललक, तबाही निश्चित होवे ।।
त्रिसोता = भागीरथी ,अलकनंदा और मन्दाकिनी

10 comments:

  1. प्रकृति और हम एक दुसरे से जुड़े हुए हैं, बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुती।

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  2. आपकी यह रचना कल मंगलवार (02-07-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  3. जल-समाधि जल-व्याधि, बहा मलबा आघाती |
    इधर इंद्र उत्पात , उधर इंद्रा का नाती ||


    बड़े बांधों कथित आधुनिकता के नेहरूवीयन मंदिरों (बड़े बांधों )की पोल खोलती पर्यावरण चेतना लिए बेहतरीन रचना .ॐ शान्ति .

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  4. बड़े बांधों कथित आधुनिकता के नेहरूवीयन मंदिरों (बड़े बांधों )की पोल खोलती पर्यावरण चेतना लिए बेहतरीन रचना .ॐ शान्ति .

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  5. आज सब दब गए,इस दर्द के, पहाड़ तले
    अब तो लगता है,रोते, उम्र गुज़र जायेगी !

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  6. रहा खड़ा मंदिर,दबे,मांगा जिसने त्राण
    हे संहारक,क्या सिरजा,ले भक्तों के प्राण!

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