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Tuesday, 19 February 2013

सकल देह जलजाय, अजब प्रेमी वैरागी-

 1
रागी है यह मन मिरा, तिरा बिना पतवार |
इत-उत भटके सिरफिरा, देता बुद्धि नकार |
देता बुद्धि नकार, स्वार्थी सोलह आने |
करे झूठ स्वीकार, बनाए बड़े बहाने |
विरह-अग्नि दहकाय, लगन प्रियतम से लागी |
सकल देह जलजाय, अजब प्रेमी वैरागी ||
 
 2
  तेरी मुरली चैन से, रोते हैं इत नैन । 
विरह अग्नि रह रह हरे, *हहर हिया हत चैन । 
*हहर हिया हत चैन, निकसते बैन अटपटे । 
बीते ना यह रैन, जरा सी आहट खटके । 
दे मुरली तू भेज, सेज पर सोये मेरी । 
सकूँ तड़पते देख, याद में रविकर तेरी ॥ 
*थर्राहट

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर हुज़ूर | लाजवाब

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  2. लाजबाब,आभार आदरणीय.

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  3. बहुत खूब, सुन्दर
    सादर !

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  4. 1
    रागी है यह मन मिरा, तिरा बिना पतवार |
    इत-उत भटके सिरफिरा, देता बुद्धि नकार |
    देता बुद्धि नकार, स्वार्थी सोलह आने |
    करे झूठ स्वीकार, बनाए बड़े बहाने |
    विरह-अग्नि दहकाय, लगन प्रियतम से लागी |


    बहुत बढ़िया रचना पढ़ वाई है आपने .बहुत खूब .शुक्रिया आपकी टिपण्णी का .

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  5. बहुत सुन्दर

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