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Friday, 4 May 2012

राह - राह 'रविकर' रमता, मरी - मरी मिलती ममता-

  शोक-वाटिका की ऐ सीते !
     राम-लखन के तरकश रीते ||
जगह-जगह जंगल-ज्वाला , उठे धुआँ काला-काला|
प्रर्यावरण - प्रदूषण  ने, खर - दूषण  प्रतिपल  पाला || 
          कुम्भकरण-रावण जीते - 
          राम-लखन के तरकश रीते||
नदियों में मिलते नाले, मानव-मळ मुर्दे डाले |
'विकसित' की आपाधापी, बुद्धि पर लगते ताले||
          भाष्य बांचते भगवत-गीते -
         राम-लखन के तरकश रीते||
पनपे हरण - मरण  उद्योग, योग - भोग - संयोग - रोग |
काम-क्रोध-मद-लोभ समेटे, भव-सागर में भटके लोग ||
          मनु-नौका में लगा पलीते - 
         राम-लखन के तरकश रीते||
राग - द्वेष - ईर्ष्या  फैले,  हो  रहे  आज  रिश्ते  मैले |
पशुता भी चिल्लाये-चीखे, मानवता का दिल दहले ||
         रक्त-बीज का रक्त न पीते -
         राम-लखन के तरकश रीते||
राह - राह  'रविकर' रमता, मरी - मरी मिलती ममता |
जगह-जगह जल्लाद जुनूनी, भ्रूण चूर्ण कर न थमता ||
         कोख नोचते कुक्कुर-चीते - 
        राम-लखन के तरकश रीते ||

7 comments:

  1. आज का समय यही सब प्रदर्शित कर रहा है!...सुन्दर प्रस्तुति!...आभार!

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  2. वाह ... रविकर जी ... समा बाँध देते हैं आप ...

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  3. बहुत खूब

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  4. प्रर्यावरण - प्रदूषण ने, खर - दूषण प्रतिपल पाला ||
    कृपया शुद्ध रूप पर्यावरण लिख लें .आज तो उत्कृष्टता को आपने और भी शिखर पर पहुंचा दिया .

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  5. तुलसी के पत्ते सूखे हैं ,और कैक्टस आज हरे हैं ,
    आज राम को भूख लगी है ,रावण के भण्डार भरें हैं .इसे आगे बढायें भाई साहब .अपनी रचना जैसा विस्तार दें .

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