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Saturday, 12 May 2012

पाए ना दो कौर, लाज चुपचाप समेटे-

(1)
मन विकसित न हो सका,  तन का हुआ विकास ।
बीस साल से ढो रहा, ममता  का विश्वास ।
ममता  का विश्वास, सबल अबला है माई ।
नब्बे के.जी. भार, उठा के बाहर लाई  ।
रविकर वन्दे मातु , उलाहन देता भगवन ।
तुझसे मातु महान, निरोगी कर तो तन मन ।।
(2)
 अस्थि-मज्जा रक्त तक, माता रही लुटाय ।
 दो-दो पुत्रों की रही, पल पल बोझ उठाय ।
पल-पल बोझ उठाय, बनाई काबिल बन्दा ।
अब माता मुहताज, लगाएं बेटे चंदा ।
कैसा गंदा दौर, भूलते माँ को बेटे ।
पाए ना दो कौर, लाज चुपचाप समेटे ।।

10 comments:

  1. वाकई प्रेरणादायक

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  2. रविकर पुंज स्वागतम .माता के दो बिम्ब जुटाए रविकर जी ,कैसी है औलाद बताये रविकर जी

    अस्थि-मज्जा रक्त तक, माता रही लुटाय ।
    दो-दो पुत्रों की रही, पल पल बोझ उठाय ।
    पल-पल बोझ उठाय, बनाई काबिल बन्दा ।
    अब माता मुहताज, लगाएं बेटे चंदा ।
    कैसा गंदा दौर, भूल माता को बेटे ।
    पाए ना दो कौर, पड़ी है लाज समेटे ।।

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  3. मातृ दिवस का एक रूप यह भी है।

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  4. रविकर जी आपको हमेशा चुटीली कवितायें कहते पाया है.. मगर आज आपकी कविता के आरम्भ में लगा चित्र विचलित कर गया..!! वंदे मातरम!!

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  5. सुंदर अभिव्यक्ति !!

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  6. happy mothers day
    thoughtful poem

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  7. मुझे याद है ,थपकी देकर,
    माँ अहसास दिलाती थी !
    मधुर गुनगुनाहट सुनकर
    ही,आँख बंद हो जाती थी !
    आज वह लोरी उनके स्वर में, कैसे गायें मेरे गीत !
    कहाँ से ढूँढूँ ,उन यादों को,माँ की याद दिलाते गीत !

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