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Thursday, 12 April 2012

रक्त-कोष की पहरेदारी-

चालबाज, ठग, धूर्तराज   सब,   पकडे   बैठे   डाली - डाली |

आज बाज को काम मिला वह करता चिड़ियों की रखवाली |


गौशाला मे धामिन ने जब, सब गायों पर छान्द लगाया |
मगरमच्छ ने  अपनी हद में,  मछली-घर मंजूर  कराया ||  


घोटाले-बाजों  ने ले ली,  जब तिहाड़ की जिम्मेदारी |
जल्लादों ने झपटी झट से,  मठ-मंदिर की  कुल मुख्तारी ||


अंग-रक्षकों  ने  मालिक  की  ले ली  जब से मौत-सुपारी |
लुटती  राहें,   करता  रहबर  उस  रहजन  की  ताबेदारी  ||


शीत - घरों  के  बोरों  की  रखवाली  चूहों  ने हथियाई  |
भले - राम   की   नैया   खेवें,  टुंडे - मुंडे  अंधे भाई  ||


तिलचट्टों ने तेल कुओं पर, अपनी कुत्सित नजर गढ़ाई |
 रक्त-कोश  की  पहरेदारी,  नर-पिशाच के जिम्मे  आई |



11 comments:

  1. कमाल की रचना है। व्यवस्था पर गहरा कटाक्ष।

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  2. सर्वप्रथम बैशाखी की शुभकामनाएँ और जलियाँवाला बाग के शहीदों को नमन!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
    सूचनार्थ!

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  3. वाह,वाह!...बहुत बढ़िया!...आभार!...बैशाखी की शुभकामनाएं!

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  4. आधुनिक राजनीतिक परिदृश्य पर व्यंग्य करती अच्छी कविता।

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  5. मुझे पता नहीं था कि रविकर जलेबियाँ यहाँ पका रहा हैं
    चर्चा मंच में किसी और की नमकीन परोसता जा रहा है।

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  6. Nice post

    आशा है कि ब्लॉगर्स का ध्यान इस पर जाएगा और उत्पीड़न करने की भावना कमज़ोर पड़ेगी।

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  7. बहुत सामयिक, बहुत प्रासंगिक, बहुत प्रभावकारी। बधाई रविकर जी!

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  8. आनंद आ गया...हर जगह व्यवस्था...पूरी तरह ध्वस्त है...

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  9. गजबे लिखा है गुरु...!

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