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Monday, 22 April 2013

करे आंकड़े पेश, बताये दिल्ली कमतर


कमतर कमकस कमिश्नर, नर-नीरज पर दाग । 
कफ़नखसोटी में लगा, लगा रहा फिर आग । 
लगा रहा फिर आग, कमीना बना कमेला । 
संभले नहीं कमान, लाज से करता खेला । 
गृहमंत्रालय ढीठ, राज्य की हालत बदतर । 
करे आंकड़े पेश,  बताये दिल्ली कमतर ॥ 
कमकस=कामचोर 
कमेला = कत्लगाह (पशुओं का )

नष्ट पुरुष से हो चुका, नारिजगत का मोह-
छली जा रहीं नारियां, गली-गली में द्रोह ।

नष्ट पुरुष से हो चुका, नारिजगत का मोह |



नारिजगत का मोह, गोह सम नरपशु गोहन ।

बनके गौं के यार, गोरि-गति गोही दोहन ।



नरदारा नरभूमि, नराधम हरकत छिछली । 

फेंके फ़न्दे-फाँस , फँसाये फुदकी मछली । ।  
गोहन = साथी-संगी 
गौं के यार=अपना अर्थ साधने वाला
गोही = गुप्त  
नरदारा=नपुंसक 
नरभूमि=भारतवर्ष 
फुदकी=छोटी चिड़िया
हुआ विधाता बाम, पुरुष जो बना बिधाता
धाता कामी कापुरुष, रौंदे बेबस नार । 
बरबस बस पर चढ़ हवस, करे जुल्म-संहार । 

करे जुल्म-संहार, नहीं मिल रही सुरक्षा । 
गली हाट घर द्वार, सुरक्षित कितनी कक्षा ।  
 
करो हिफाजत स्वयं,  कुअवसर असमय आता । 
हुआ विधाता बाम, पुरुष जो बना बिधाता ॥ 



दहले दिल्ली देश, दरिंदा दुष्ट दहाड़े -


 भड़की भारी भीड़ फिर, कब तक सहे अधर्म । 
घायल करता मर्म को, प्रतिदिन का दुष्कर्म ।
प्रतिदिन का दुष्कर्म, पेट गुडिया का फाड़े । 
दहले दिल्ली देश, दरिंदा दुष्ट दहाड़े । 
नहीं सुरक्षित दीख, देश की दिल्ली लड़की । 
माँ बेटी असहाय, पुन: चिंगारी भड़की ॥ 




छद्म वेश धर दुष्टता, पाए क्योंकर ठौर । 
 बोझिल है वातावरण , जहर बुझा नव-दौर । 
 
जहर बुझा नव-दौर, गौर से दुष्ट परखिये । 
भरे पड़े हैवान, सुरक्षित बच्चे रखिये । 
दादा दादी चेत, पुन: ले जिम्मा रविकर ।  
 विश्वासी आश्वस्त, लूटते छद्म वेश धर ॥ 






दाग लगाए दुष्टता,  पर दिल्ली दिलदार ।
 शील-भंग दुष्कर्म पर,  चुप शीला-सरकार
। 


चुप शीला-सरकार, मिनिस्टर सन्न सुशीला । 

दारुण-लीला होय, नारि की अस्मत लीला । 


नीति-नियम कानून, व्यवस्था से भर पाए । 

पुलिस दाग के तोप, दाग पर दाग लगाए ॥ 


टैग लगी लाइन मिली, लिख दिल्ली दिलदार -


दिल्ली में पर्यटन का, करना है विस्तार । 
टैग लगी लाइन मिली, लिख दिल्ली दिलदार । 
लिख दिल्ली दिलदार, छुपा इतिहास अनोखा । 
किन्तु रहो हुशियार, यहाँ पग पग पर धोखा । 
लूट क़त्ल दुष्कर्म, ठोकते मुजरिम किल्ली । 
रख ताबूत तयार, रिझाए दुनिया दिल्ली ॥ 
पश्चिम का जंजाल कह, नहीं गलाओ दाल-



नोट:अधिकतर कुंडलियाँ / टिप्पणियां मूल लेख के अनुसार हैं-
कथा भागवत की ख़तम, देह देश को दान ।

रखिये अब तलवार भी, खाली खाली म्यान ।
खाली खाली म्यान, आग तन-बदन लगाए ।

गाड़ी यह मॉडर्न, बिना ब्रेक सरपट जाए ।

झटके खाए सोच, चाल है दकियानूसी ।

अपनी रक्षा स्वयं, करो मत काना-फूसी ।।

 



मोमेंटम में तन-बदन, पश्चिम का आवेग ।

 सोच रखी पर ताख पर, काट रही कटु तेग ।


काट रही कटु तेग, पुरातन-वादी भारत ।

रहा अभी भी रेंग, रेस नित खुद से हारत ।
ब्रह्मचर्य का ढोंग, आस्था का रख टम-टम ।
पश्चिम का आवेग, सोच को दे मोमेंटम।

सत्य सर्वथा तथ्य यह, रोज रोज की मौत |
जीवन को करती कठिन, बेमतलब में न्यौत |
बेमतलब में न्यौत , एक दिन तो आना है |
फिर इसका क्या खौफ, निर्भया मुस्काना है |
कर के जग चैतन्य, सिखा के जीवन-अर्था |
मरने से नहीं डरे, कहे वह सत्य सर्वथा ||


लेख लिखाते ढेर से, पढ़िए सहज उपाय ।
रेप केस में सेक्स ही, पूरा बदला जाय ।
पूरा बदला जाय, भ्रूण हत्या से बचकर ।
भेदभाव से उबर, करे सर्विस जब पढ़कर ।
दुर्जन से घबराय, छोड़ दिल्ली जो जाते ।
भरपाई हो मित्र, रहो फिर लेख लिखाते ।।



इक नारी को घेर लें, दानव दुष्ट विचार ।
 शक्ति पुरुष की जो बढ़ी, अंड-बंड व्यवहार ।
अंड-बंड व्यवहार, करें संकल्प नारियां ।
होय पुरुष का जन्म, हाथ पर चला आरियाँ ।
काट रखे इक हाथ, बने नहिं अत्याचारी ।
कर पाए ना घात,  पड़े भारी इक नारी ।।


पुत्रों पर दिखला रहीं, माताएं जब लाड़ |

पुत्री पर प्रतिबन्ध क्यों, करती हो खिलवाड़ |  
करती हो खिलवाड़, हमें है सोच बदलनी |
भेदभाव यह छोड़, पुत्र सम पुत्री करनी |
होकर के गंभीर, ध्यान देना है मित्रों |  
अपनी चाल सुधार, बाप बनना है पुत्रों |

आशा मिलती राम में, नर नारी संजोग |
आये आसाराम से, जाने कितने लोग |
जाने कितने लोग, भोग की गलत व्याख्या |
नित आडम्बर ढोंग, बड़ी भारी है संख्या |
नारी नहिं गलनीय, नहीं वह मीठ बताशा |
सुता सृष्टि माँ बहन, सदा दुनिया की आशा ||





छी छी छी दारुण वचन, दारू पीकर संत ।
बार बार बकवास कर, करते पाप अनंत ।
करते पाप अनंत, कथा जीवन पर्यन्तम ।
लक्ष भक्त श्रीमन्त, अनुसरण करते पन्थम ।
रविकर बोलो भक्त, निगलते कैसे मच्छी ।
आशा उगले राम, रोज खा कर जो छिच्छी ।।  

जस्टिस वर्मा को मिले, भाँति-भाँति के मेल ।
रेपिस्टों की सजा पर, दी दादी भी ठेल । 
दी दादी भी ठेल, कत्तई मत अजमाना ।
सही सजा है किन्तु, जमाना मारे ताना ।
जो भी औरत मर्द, रेप सम करे अधर्मा । 
चेंज करा के सेक्स, सजा दो जस्टिस वर्मा ।।



लक्ष्मण रेखा खींच के, जाय बहाना पाय ।

खून बहाना लूटना, दे मरजाद मिटाय ।
दे मरजाद मिटाय, सदी इक्कीस आ गई ।

किन्तु सोच उन्नीस, बढ़ी है नीच अधमई ।


पुरुषों के कुविचार, जले पर केवल रावण।

 रेखा चलूं नकार, पुरुष भव खींचा, लक्ष्मण ।
आगे दारुण कष्ट दे, फिर काँपे संसार |
नाबालिग को छोड़ते, जिसका दोष अपार |
जिसका दोष अपार, विकट खामी कानूनी |
भीषण अत्याचार, करेगा दुष्ट-जुनूनी |
लड़-का-नूनी काट, कहीं पावे नहिं भागे |
श्रद्धांजली विराट, तख़्त फांसी पर आगे ||



 
दुनिया भागमभाग में, घायल पड़ा शरीर |
सुने नहीं कोई वहां, करे बड़ी तकरीर |
करे बड़ी तकरीर, सोच क्या बदल चुकी है |
नहीं बूझते पीर, निगाहें आज झुकी हैं |
सामाजिक कर्तव्य, समझना होगा सबको |
अरे धूर्तता छोड़, दिखाना है मुँह रब को ||
 मिनी इण्डिया जागता, सोया भारत देश |
फैली मृग मारीचिका, भला करे आवेश |
  भला करे आवेश, रेस नहिं लगा नाम हित | 
लगी मर्म पर ठेस, जगाये रखिये यह नित |
 करिए औरत मर्द, सुरक्षित दिवस यामिनी |
रक्षित नैतिक मूल्य, बचाए सदा दामिनी ||

आँखों में बेचैनियाँ, काँप दर्द से जाय |
सांत्वना से आपकी, नहीं रूह विलखाय |
नहीं रूह विलखाय, खाय ली देह हमारी |
लाखों लेख लिखाय, बचे पर अत्याचारी |
है भारत धिक्कार, रेप हों हर दिन लाखों |
मरें बेटियाँ रोज, देखते अपनी आँखों ||

 


बीस साल का हाल है, काल बजावे गाल ।
पश्चिम का जंजाल कह, नहीं गलाओ दाल ।
नहीं गलाओ दाल, दाब जब कम हो जाये ।
काली-गोरी दाल, नहीं रविकर पक पाए ।
होवे पेट खराब, नहीं जिम्मा बवाल का ।
खुद से खुद को दाब, तजुर्बा बीस साल का ।।
कर इनको आजाद, अन्यथा तोड़े खूंटा -

हारा कुल अस्तित्व ही, जीता छद्म विचार |
वैदेही तक देह कुल, होती रही शिकार |

होती रही शिकार, प्रपंची पुरुष विकारी |
चले चाल छल दम्भ, मकड़ जाले में नारी |

सहनशीलता त्याग, पढाये पुरुष पहारा |
ठगे नारि को रोज, झूठ का लिए सहारा ||


हदे पार करते रहे, जब तब दुष्टाबादि |
*अहक पूरते अहर्निश, अहमी अहमक आदि |

अहमी अहमक आदि, आह आदंश अमानत |
करें नारि-अपमान, इन्हें हैं लाखों लानत |

बहन-बेटियां माय, सुरक्षित प्रभुवर करदे |
नाकारा कानून  व्यवस्था व्यर्थ ओहदे ||

*इच्छा / मर्जी


हिला हिला सा हिन्द है, हिले हिले लिक्खाड़ |

भांजे महिला दिवस पर, देते भूत पछाड़ |



देते भूत पछाड़, दहाड़े भारत वंशी |

भांजे भांजी मार, चाल चलते हैं कंसी |



बड़े ढपोरी शंख, दिखाते ख़्वाब रुपहला |
  
महिला नहिं महफूज, दिवस बेमकसद महिला ||




गोया गैया गोपियाँ, गोरखधंधा गोप |
बन्धन में वे बाँध के,  मन की मर्जी थोप | 

मन की मर्जी थोप, नारि को हरदम लूटा |
कर इनको आजाद, अन्यथा तोड़े खूंटा |

वही काटते आज, जमाने ने जो बोया |
रहें कुंवारे पुरुष, अश्रु से नयन भिगोया ||




  नारि-सशक्तिकरण में, जगह जगह खुरपेंच |
राम गए मृग छाल हित, लक्ष्मण रेखा खेंच |
लक्ष्मण रेखा खेंच, नीच रावण है ताके |
साम दाम भय भेद, प्रताणित करे बुलाके |

अक्षम है कानून, पुलिस अपनों से हारी |
नारि नहीं महफूज, लूटते रहे *अनारी ||





सकते में हैं जिंदगी, माँ - बहनों की आज |

प्रश्न चिन्ह सम्बन्ध पर, आय नारि को लाज |


आय नारि को लाज, लाज लुट रही सड़क पर |

दब जाए आवाज, वहीँ पर जाती है मर |


कहीं नहीं महफूज, दुष्ट मिल जाँय बहकते |

बने सुर्खियाँ न्यूज, नहीं कुछ भी कर सकते ||




विष्णु-प्रिया पद चापती, है लक्ष्मी साक्षात |  
उधर कालिका दाबती, रख कर शिव पर लात |
रख कर शिव पर लात, रूप दोनों ही भाये |
नारीवादी किन्तु, विष्णु पर हैं भन्नाए |


शिव के सिर पर गंग, उधर कैकेयी की हद |
इत लक्ष्मी को मिला, प्यार से विष्णु-प्रिया पद ||





















3 comments:

  1. वाह आदरणीय गुरुदेव श्री वाह बहुत ही सुन्दर एक से बढ़कर एक कुण्डलिया वर्त्तमान घटना का सुन्दर चित्रण. हार्दिक बधाई स्वीकारें.

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  2. बहुत ही सटीक और प्रभावशाली रचना

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